मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१६४ मनुस्मृति ।
तपश्चरंश्चोग्रतरं शोषयेद्देहमात्मनः ॥ २४ ॥ अग्नीनात्मनि वैतानान्समारोप्य यथाविधि । अनग्निरनिकेतः स्यान्मुनिर्मूलफलाशनः ॥ २५ ॥ अप्रयत्नः सुखार्थेषु ब्रह्मचारी धराशयः । शरणेष्वममश्चैव वृक्षमूलनिकेतनः ॥ २६ ॥ तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्ष्यमाहरेत् । गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ॥ २७ ॥ ग्रामादाहृत्य वाश्नीयादष्टौ ग्रासान्वने वसन् । प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा ॥ २८ ॥ एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षाविप्रो वने वसन् । विविधाश्चोपनिषदोरात्मसंसिद्धये श्रुतीः ॥ २९ ॥
तीनोंकाल स्नान करे, देवता और पितरों को तृप्त करे और उग्र तपस्या करके अपना शरीर सुखाया करे। शास्त्रविधि के अनुसार अग्निहोत्र का अपने में समारोप करके, अग्नि और घर को त्याग दे और मौन रहकर फल मूल से निर्वाह किया करे। ब्रह्मचर्य से रहे, भूमि पर सोवे, सुख के पदार्थों का उपाय न करे और निवास- स्थान में ममता छोड़कर वृक्ष के नीचे रहाकरे। वनवासी ब्राह्मणों से प्राणरक्षार्थ भिक्षा लावे या वनवासी गृहस्थ द्विजों से ही मांग लावे। यह भिक्षा न मिले तो गाँव से भीख पत्ता या हाथ में मांग कर, आठ ग्रास खा लेवे ॥ २४-२९ ॥
ऋषिभिर्ब्राह्मणैश्चैव गृहस्थैरेवं सेविताः । विद्यातपोविवृद्ध्यर्थं शरीरस्य च शुद्धये ॥ ३० ॥ अपराजितां वास्थाय व्रजेद्दिशमजिह्मगः ।