मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१६६ मनुस्मृति । प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् । आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणःप्रव्रजेद्गृहात् ॥३८॥ संन्यासाश्रम-धर्म । आश्रम से आश्रम अर्थात् ब्रह्मचर्य से गृहस्थ, उससे वानप्रस्थ में जाकर और हवन, भिक्षा, बलि आदि से थका हुआ, संन्यास लेनेवाला पुरुष देह त्याग करने पर मोक्ष पाता है। ऋषिरृण, देव- ऋण और पितृऋण इन तीनों से छुटकारा पाने पर, मनको मोक्ष धर्म में लगावे अन्यथा करने से नरकगामी होता है । विधि से वेदाध्ययन-ऋषिऋण, धर्म विवाह से पुत्रोत्पादन—पितृऋण, यज्ञ आदि—देवऋण, इनसे यथाशक्ति छुट्टी लेकर मोक्ष में चित्त ल- गावे । जो पुरुष वेदादि का पठन न करके संन्यास लेता है वह नरक में पड़ता है । सर्वस्व दक्षिणा की प्रजापति इष्टि को करके और आत्मा में अग्नि का आधान करके ब्राह्मण को संन्यास ग्रहण करना चाहिए ॥ ३४-३८ ॥ यो दत्त्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात् । तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः॥ ३६ ॥ यस्मादण्वपि भूतानां द्विजात्नोत्पद्यते भयम् । तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ ४० ॥ आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः । समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ ४१ ॥ एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायवान् । सिद्धिमेकस्य संपश्यन्न जहाति न हीयते ॥ ४२ ॥ अनग्निरनिकेतः स्याद्ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् । उपेक्षकोऽशङ्कुसुको मुनिर्भावसमाहितः ॥ ४३ ॥