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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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छठवां अध्याय । १६७ जो पुरुष सब प्राणियों को अभय देकर, घर से चौथे आश्रम को जाता है उसको तेजोमय लोक प्राप्त होते हैं । जिस द्विज से प्राणियों को ज़रा भी भय नहीं होता, उसको देह त्यागने पर कहीं किसीका भय नहीं होता । घर से निकल कर, पवित्र दण्ड और कमण्डलु धारण करके, मौन भाव से विचरे और सब लौकिक कार्यों से विरक्त हो जावे । अकेला ही नित्य विचरे किसीकी मदद न लेवे, क्योंकि अकेले ही मुक्ति मिलती है । ऐसे पुरुष को न किसी के त्याग का दुःख होता है और न उससे दूसरे कोही दुःख पहुँचता है । अग्नि और घर को छोड़कर भिक्षा के लिए गाँव का सहारा रक्खे । दुःख में चिन्ता न करे और स्थिर चित्त से काल बितावे ॥ ३६-४३ ॥ कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहायता । समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ ४४ ॥ नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् । कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥ ४५ ॥ दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् । सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ ४६ ॥ भिक्षापात्र, वृक्ष के नीचे निवास, फटे टूटे वस्त्र, किसी की मदद न लेना और सब के ऊपर समान भाव रखना, ये सब मुक्त पुरुष के लक्षण हैं। न मरने की और न जीने की ही इच्छा करे किन्तु काल की प्रतीक्षा किया करे जैसे नौकर आज्ञा की प्रतीक्षा करता है। आँखों से देखकर भूमि में पैर धरे, जल छानकर पीवे, सत्य वाणी बोले और मन पवित्र रखकर आचरण करे ॥ ४४-४६ ॥ अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन । न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ४७ ॥ क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ।