मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१६८ मनुस्मृति। सप्तद्वारावकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत् ॥ ४८ ॥ अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः। आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ॥ ४६ ॥ कोई व्यर्थ झगड़ा करे तो उसको सहन करे, किसीका अपमान न करे। और इस देह से किसी से वैर करना भी अच्छा नहीं है। क्रोध करनेवाले पर क्रोध, निन्दक की निन्दा न करे वरन कुशल वृत्तान्त उसका पूंछे। पांच इन्द्रियां, मन और बुद्धि इन सात द्वारों में बिखरी हुई असत्य वाणी न बोले, किन्तु ईश्वर चिन्ता में लगा रहे। परब्रह्म के ध्यान में मग्न, योगासन से स्थित, ममता को छोड़- कर, केवल अपनी सहायता से ही मोक्षसुख चाहता हुआ इस जगत् में विचरे ॥ ४७-४६ ॥ न चोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्राङ्गविद्यया। नानुशासनवादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत कर्हिचित्॥५०॥ न तापसैर्ब्राह्मणैर्वा वयोभिरपि वा श्वभिः। आकीर्णं भिक्षुकैर्वाऽन्यैरगारमुपसंव्रजेत् ॥ ५१ ॥ कॢप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान्। विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ ५२ ॥ अतैजसानि पात्राणि तस्य स्युर्निर्व्रणानि च। तेषामद्भिःस्मृतं शौचं चमसानामिवाध्वरे ॥ ५३ ॥ अलाबुं दारुपात्रं च मृण्मयं वैदलं तथा। एतानि यतिपात्राणि मनुःस्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥५४॥ भूकम्प आदि उत्पात, ग्रह-नक्षत्र का फल, हाथकी रेखा, उप- देश या शास्त्रार्थ के बहाने भिक्षा की इच्छा न करनी। वानप्रस्थ, दूसरे कोई ब्राह्मण, पक्षी, कुत्ता या भिखारियों से घिरे स्थान में