मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextछठवां अध्याय । २०१ न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति ॥ ६७ ॥ इस देह से निकलना, फिर गर्भ में उत्पत्ति और लाखों योनियों में इस जीवात्मा का जाना, ये सब अपने कर्मफलं हैं। अधर्म से दुःख में पड़ना और धर्म से अक्षय सुख-मोक्ष मिलना-इसका विचार करे। योग से परमात्मा की सूक्ष्मता का ध्यान करे । और उत्तम-अधम योनियों में शुभाशुभ फलभोगार्थ जीवों की उत्पत्ति का विचार करे। आश्रम के विरुद्ध कोई दोष भी लगे, तोभी जीवों पर समभाव रखकर, धर्माचरण करता रहे । क्योंकि दण्ड-कम- ण्डलु चिह्न धारण करना ही धर्माचरण नहीं कहलाता । निर्मली के फल का नाम लेने से ही जल निर्मल नहीं होता, उसको जल में छोड़ने से होता है । ऐसेही आश्रमचिह्न धारण से फल नहीं होता किन्तु आचरण से होता है ॥ ६३-६७ ॥ संरक्षणार्थं जन्तूनां रात्रावहनि वा सदा । शरीरस्यात्यये चैव समीक्ष्य वसुधां चरेत् ॥ ६८ ॥ अह्ना रात्र्या च याञ्जन्तून् हिनस्त्यज्ञानतो यतिः । तेषां स्नात्वा विशुद्धयर्थं प्राणायामान्षडाचरेत् ॥ ६९ ॥ : प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः । व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः ॥ ७० ॥ दिन या रात में, संन्यासी को भूमि में जीवों को बचाकर पैर रखना चाहिए। चाहे शरीर को दुःख भी मिले। जो यति चलता फिरता अनजान में, जीवों की हिंसा करता है, उस पाप के ना- शार्थ स्नान करके छ प्राणायाम करना चाहिए । यदि ब्राह्मण प्रणव और व्याहृति से विधिपूर्वक तीन भी प्राणायाम करे तो भी उसको परम तप मानना चाहिए ॥ ६८-७० ॥ दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः । २६