मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 342 of 649
Read in context२०२ मनुस्मृति। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥७१॥ प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम् । प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥७२॥ उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयामकृतात्मभिः । ध्यानयोगेन संपश्येद्गतिमस्यान्तरात्मभिः ॥ ७३ ॥ सम्यग्दर्शनसंपन्नः कर्मभिर्न निवध्यते । दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते ॥ ७४ ॥ जैसे सुवर्ण आदि धातुओं का मैल अग्नि में धौंकने से जल जाता है वैसेही प्राणायाम से इन्द्रियों के दोष जलजाते हैं। प्राणा- याम से दोषों को, ब्रह्म में मनकी धारणा से पाप को, इन्द्रियसंयम से विषयों को और ध्यान से काम, क्रोध, मोह आदि को जलावे। इस जीव की ऊंची, नीची योनियों में जन्मप्राप्ति का ध्यान योग से विचार करे, क्योंकि, जीवगति सब को ज्ञात नहीं होती । ब्रह्म साक्षात्कार करनेवाला पुरुष कर्मबन्धन में नहीं बँधता और जो उससे रहितहै वह जन्म-मरण के बन्धन में पड़ता है ॥ ७१-७४॥ अहिंसयेन्द्रियासङ्गैर्वैदिकैश्चैव कर्मभिः । तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम् ॥ ७५ ॥ अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् । चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्रपुरीषयोः ॥ ७६ ॥ जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् । रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत् ॥ ७७ ॥ नदीकूलं यथा वृक्षो वृक्षं वा शकुनिर्यथा । तथा त्यजन्निमं देहं कृच्छ्राद्ग्राह्याद्विमुच्यते ॥ ७८ ॥