BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 343 of 649

Read in context
Page 343

छठवां अध्याय । २०३ अहिंसा, इन्द्रियनिग्रह, वैदिक कर्मानुष्ठान, व्रत आदि उग्र तपों से इस लोक में ब्रह्मपद का साधन होता है । यह शरीर हड्डी रूप खंभा में स्नायुरूप डोरियों से बँधा, मांस और रुधिर रूप गारा से लिपा चमड़ा से मढ़ा, मल-मूत्र और दुर्गन्धि से पूर्ण है । बुढ़ापा शोक, रोग, दुःख का घर है, रजोगुणी है, अनित्य है, पांच महाभूतों का निवासस्थान है, इससे ममता छोड़देनी चा- हिए । जैसे नदीतट को वृक्ष छोड़ देता है, पक्षी वृक्ष को छोड़ देता है, वैसे संन्यासी इस देह की ममता छोड़ देवे तो कठिन संसारी ग्राह से छूट जाता है ॥ ७५-७८ ॥ प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् । विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ ७६ ॥ यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृहः । तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ ८० ॥ अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सङ्गान् शनैः शनैः । सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्माण्येवावतिष्ठते ॥ ८१ ॥ ध्यानिकं सर्वमेवैतद्यदेतदभिशब्दितम् । नह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते ॥ ८२ ॥ ब्रह्मज्ञानी पुरुष अपने प्रिय पुरुषों के ऊपर पुण्य और अप्रियों के ऊपर पाप त्यागकर, ध्यानयोग से सनातन ब्रह्मपद को प्राप्त होता है । जब संन्यासी सब भांति निःस्पृह होजाता है, तब इस लोक में सुख पाता है और मरण के बाद मोक्षसुख को पाता है । इस रीति से धीरे धीरे संग को छोड़कर दुःखसुख से मुक्त होकर, ब्रह्म में ही स्थित होजाता है । यह जो धन, पुत्र आदि की ममता का त्याग कहा है, वह सब परमात्मा के ध्यान से ही होसकता है । जिसको आत्मा के स्वरूप का ज्ञान नहीं है वह ध्यानादि कर्मों का फल नहीं पाता है ॥ ७६-८२ ॥