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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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३०४ मनुस्मृति । अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च । आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत् ॥ ८३ ॥ इदं शरणमज्ञानामिदमेव विजानताम् । इदमन्विच्छतां स्वर्गमिदमानन्त्यमिच्छताम् ॥ ८४ ॥ अनेन क्रमयोगेन परिव्रजति यो द्विजः । स विधूयेह पाप्मानं परंब्रह्माधिगच्छति ॥ ८५ ॥ एष धर्मोऽनुशिष्टो वो यतीनां नियतात्मनाम् । वेदसंन्यासिकानां तु कर्मयोगं निबोधत ॥ ८६ ॥ यज्ञ, देवता और आत्मा के विषय में जो वेदमन्त्र हैं और वे- दान्त ( ब्रह्मज्ञान ) प्रतिपादक जो मन्त्र हैं उनका सदा पाठ और जप विचार करे । यह वेद ज्ञानी, अज्ञानी और स्वर्ग, मोक्ष की इच्छावालों का भी शरण है अर्थात् वेद ही सर्वस्व है । इस क्रम से जो द्विज संन्यास धारण करता है, वह सब पापों से छूटकर, ब्रह्मभाव में लीन होजाता है । इस प्रकार, यह धर्म जितेन्द्रिय यतियों का कहा गया ,है अब वेद संन्यासी, अर्थात् जो चिह्न धारण गृहत्याग न करके ज्ञान सेही संन्यासी है उनका कर्मयोग सुनो ॥ ८३-८६ ॥ ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । एते गृहस्थप्रभवाश्चत्वारः पृथगाश्रमाः ॥ ८७ ॥ सर्वेऽपि क्रमशस्त्वेते यथाशास्त्रं निषेविताः । यथोक्तकारिणं विप्रं नयन्ति परमां गतिम् ॥ ८८ ॥ सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः । गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान् बिभर्त्ति हि ॥ ८६ ॥