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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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२१२ मनुस्मृति । न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥ ३० ॥ शुचिना सत्यसंधेन यथाशास्त्रानुसारिणा । प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३१ ॥ उसके बाद क़िला, देश और चराचर जगत् का नाश करता है। अन्तरिक्षवासी देवता और मुनियों को भी पीड़ा पहुँचाता है। मन्त्री या सेना की सहायता से रहित, लोभी, मूर्ख, निर्बुद्धि, विषयासक्त राजा से वह दण्ड अर्थात् राजधर्म नहीं चल सकता। न्यायपूर्वक मिले धन से शुद्ध, सत्यप्रतिज्ञ, शास्त्रानुसार बर्ताव करनेवाला बुद्धिमान् राजा, मन्त्री आदि की सहायता से दण्ड- विधान कर सकता है अर्थात् ऐसा राजा शिक्षा करने लायक़ होता है ॥ २६-३१ ॥ स्वराष्ट्रे न्यायवृत्तः स्याद्भृशदण्डश्च शत्रुषु । सुहृत्स्वजिह्मः स्निग्धेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः॥ ३२ ॥ एवंवृत्तस्य नृपतेः शिलोञ्छेनापि जीवतः । विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३३ ॥ अतस्तु विपरीतस्य नृपतेरजितात्मनः । संक्षिप्यते यशो लोके घृतबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३४ ॥ स्वे स्वे धर्मे निविष्टानां सर्वेषामनुपूर्वशः । वर्णानामाश्रमाणां च राजा सृष्टोऽभिरक्षिता ॥ ३५ ॥ राजा को अपने राज्य में न्यायकारी और शत्रुओं को सदा दण्ड देनेवाला, हितैषियों से कुटिलता रहित और ब्राह्मणों पर क्षमावान् होना चाहिए। ऐसा बर्ताव करनेवाले, शिलोञ्छवृत्ति से भी जीते हुए राजा का यश लोक में जल में तेल की बूंद के समान फैलता है । विषयासक्त और उक्तरीति से विपरीत आचरण करनेवाले का यश पानी में घी के बूंद की भांति संकोच