मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 353, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां अध्याय । २१३ को प्राप्त होता है। अपने अपने धर्म में चलनेवाले सब वर्णों और आश्रमों की रक्षा करनेवाला प्रजापति ने राजा उत्पन्न किया है ॥ ३२-३५ ॥ तेन यद्यत्सभृत्येन कर्तव्यं रक्षता प्रजाः । तत्तद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ३६ ॥ ब्राह्मणान् पर्युपासीत प्रातरुत्थाय पार्थिवः । त्रैविद्यवृद्धान् विदुषस्तिष्ठेत्तेषां च शासने ॥ ३७ ॥ वृद्धांश्च नित्यं सेवेत विप्रान् वेदविदःशुचीन् । वृद्धसेवी हि सततं रक्षोभिरपि पूज्यते ॥ ३८ ॥ इसलिए मन्त्रियों सहित राजा को प्रजारक्षा के लिए जो जो कर्म करने चाहिएं उनको क्रम से कहता हूं—राजा को प्रातःकाल उठकर तीनों वेदों में पारङ्गत, श्रेष्ठ, विद्वान्, ब्राह्मणों के साथ बैठना और उनकी आज्ञानुसार आचरण करना चाहिए। वेदज्ञ, पवित्र, वृद्ध ब्राह्मणों की नित्य सेवा राजा करे, क्योंकि वृद्धसेवा में तत्पर राजा दुष्ट कुजीवों से भी सत्कार पूजा पाता है ॥ ३६-३८ ॥ तेभ्योऽधिगच्छेद्विनयं विनीतात्मापि नित्यशः । विनीतात्मा हि नृपतिर्न विनश्यति कर्हिचित् ॥ ३६ ॥ बहवोऽविनयान्नष्टा राजानः सपरिच्छदाः । वनस्था अपि राज्यानि विनयात्प्रतिपेदिरे ॥ ४० ॥ वेनो विनष्टोऽविनयान्नहुषश्चैव पार्थिवः । सुदासो यवनश्चैव सुमुखो निमिरेव च ॥ ४१ ॥ पृथुस्तु विनयाद्राज्यं प्राप्तवान् मनुरेव च । कुबेरश्च धनैश्वर्यं ब्राह्मण्यं चैव गाधिजः ॥ ४२ ॥