BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 356 of 649

Read in context
Page 356

२१६ मनुस्मृति। इस प्रकार ये सात व्यसन और इनके सम्बन्धवाले व्यसनों में एक से दूसरा अधिक कष्टदायक है । मृत्यु से व्यसन अधिक कष्टदायक माना जाता है। व्यसनी पुरुष मरकर नरक में पड़ता है और जो व्यसन से दूर है, वह स्वर्गगामी होता है । परंपरा से राजसेवक, नीतिविद्या में चतुर, शूरवीर, अच्छा निशाना लगाने वाले, कुलीन और असमय में परीक्षित, सात या आठ मुख्य राजमंत्री रखना चाहिए ॥ ५२-५४ ॥ अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् । विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम् ॥ ५५ ॥ तैः सार्धं चिन्तयेन्नित्यं सामान्यं संधिविग्रहम् । स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानि च ॥ ५६ ॥ तेषां स्वं स्वमभिप्रायमुपलभ्य पृथक् पृथक् । समस्तानां च कार्येषु विदध्याद्धितमात्मनः ॥ ५७ ॥ सर्वेषां तु विशिष्टेन ब्राह्मणेन विपश्चिता । मन्त्रयेत्परमं मन्त्रं राजा षाड्गुण्यसंयुतम् ॥ ५८ ॥ नित्यं तस्मिन् समाश्वस्तः सर्वकार्याणि निःक्षिपेत् । तेन सार्धं विनिश्चित्य ततः कर्म समारभेत् ॥ ५६ ॥ अन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन् प्राज्ञानवस्थितान् । सम्यगर्थसमाहर्तॄनमात्यान्सुपरीक्षितान् ॥ ६० ॥ जबकि गृहस्थ का एक छोटासा भी काम एक पुरुष को करना क- ठिन पड़ता है तब बड़ा भारी राजकार्य बिना सहाय अकेला राजा कैसे कर सकता है ? उन मन्त्रियों के साथ साधारण संधि-विग्रह की सलाह और दण्ड, पुर, राष्ट्र, स्थान आदि का विचार करे । द्रव्य मिलने के उपाय, धनरक्षा, देशरक्षा आदि का भी परामर्श करे । उन मन्त्रियों की अलग अलग सलाह लेकर जो अपना हित-

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित) · Page 356 of 649 · BharatKosha