मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] सातवां अध्याय। २१५
पैशुन्यं साहसं द्रोहं ईर्ष्यासूयार्थदूषणम् । वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः॥ ४८ ॥ द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः । तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ ४६ ॥ पानमक्षास्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम् । एतत्कष्टतमं विद्याच्चतुष्कं कामजे गणे ॥ ५० ॥ दण्डस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थदूषणे । क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा ॥ ५१ ॥ शिकार, जुआ, दिन में सोना, दूसरे के दोषों को कहना, स्त्री- संभोग, मद्यपान, नाच, बाजा और व्यर्थ घूमना ये दश कामके व्यसन हैं अर्थात् काम से पैदा हुए हैं। चुगली, साहस, द्रोह, ईर्षा, दूसरे के गुणों में दोष लगाना, द्रव्य हरलेना, गाली देना, कठोरपन ये आठ क्रोध से उत्पन्न व्यसन हैं। विद्वान् लोग इन दोनों प्रकार के दोषों का कारण लोभ कहते हैं, इसलिए लोभ को अवश्य छोड़ देना चा- हिए । काम से पैदा व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्रीसंग और शिकार ये एक से एक बढ़कर दुःखदायी हैं । और क्रोध से पैदा व्यसनों में मारपीट, कठोर वचन, दूसरे की धनहानि करना ये तीन बड़े दुःखदायी हैं ॥ ४७-५१ ॥ सप्तकस्यास्य वर्गस्य सर्वत्रैवानुषङ्गिणः । पूर्वं पूर्वं गुरुतरं विद्याद्व्यसनमात्मवान् ॥ ५२ ॥ व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते । व्यसन्यधोऽधो व्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः ॥ ५३ ॥ मौलाञ्छास्त्रविदः शूराल्लब्धलक्षान्कुलोद्गतान् । सचिवान्सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ ५४ ॥