मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२३४ मनुस्मृति । संधिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च । द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा ॥ १६० ॥ आसनं चैव यानं च संधिं विग्रहमेव च । कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयमेव च ॥ १६१ ॥ अपनी सीमा के पास रहनेवाले और शत्रु से मेल रखनेवाले राजा को शत्रु समझना चाहिए। शत्रु की सीमावाले राजा को मित्र और मित्र राजा की सीमावाले को उदासीन जाने। इन सब को सामादि उपायों से या एक ही से वा सब उपायों से अथवा पुरुषार्थ से, या राजनीति ही से वश में करे। मेल, लड़ाई, चढ़ाई, क़िले में रहना, अपनी सेना के दो भाग करना और अपने से बली राजा का आश्रय लेना, इन छः गुणों का नित्य विचार करे। आसन, यान, संधि, विग्रह, द्वैध और आश्रय इन गुणों को अवसर देख कर जब जैसा मौक़ा आवे तब तैसा काम करना चाहिए ॥ १५८-१६१ ॥ संधिं तु द्विविधं विद्याद्राजा विग्रहमेव च । उभे यानासने चैव द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६२ ॥ समानयानकर्माच विपरीतस्तथैव च । तदा त्वायतिसंयुक्तः संधिर्ज्ञेयो द्विलक्षणः ॥ १६३ ॥ स्वयं कृतश्च कार्यार्थमकाले काल एव वा । मित्रस्य चैवापकृते द्विविधो विग्रहः स्मृतः ॥ १६४ ॥ एकाकिनश्चात्ययिके कार्ये प्राप्ते यदृच्छया । संहतस्य च मित्रेण द्विविधं यानमुच्यते ॥ १६५ ॥ संधि, विग्रह दो दो प्रकार के हैं। आसन, यान संश्रय भी दो दो प्रकार के हैं। वर्तमान या भविष्य में लाभ के लिए, मित्र राजा