मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] सातवां अध्याय। २३३
प्रत्येकं कथिता ह्येताः संक्षेपेण द्विसप्ततिः ॥ १५७॥ मूर्ख वगैरह, तोता, मैना और स्त्रियाँ प्रायः गुप्त सम्मति को प्रकाशित कर देती हैं इसलिए इन लोगों को धीरे से हटा देना चा- हिए। दोपहर या आधी रात को विश्राम करके, मन्त्रियों के साथ या अकेला ही धर्म-अर्थ-काम का विचार करे। यदि धर्म, अर्थ, काम का परस्पर विरोध हो तो उनको मिटाकर अर्थोपार्जन, कन्यादान, पुत्रों को रक्षा और शिक्षा की चिन्ता करे। परराज्य में दूत भेजना, बाक़ी कामों का, अन्तःपुर का और प्रतिनिधियों के काम का विचार करे। आठ प्रकार के सब काम * और पञ्चवर्ग † का खूब विचार करे। मन्त्री आदि की प्रीति-अप्रीति, शत्रु, मित्र-उदासीन आदि राजमण्डल पर, विशेष ध्यान रक्खे । अपने से मध्यम बलवाले राजा के बर्ताव, जीतने की इच्छा रखनेवाले की चेष्टा, उदासीन और शत्रु राजा के वृत्तान्तों को यत्न से जानता रहे। ये मध्यम आदि चार प्रकृतियां मण्डल का मूल मानी जाती हैं और जो आठ हैं, वे सब मिलकर बारह ‡ होती हैं। मंत्री, देश, क़िला, धनभण्डार, और दण्ड ये पांच प्रकृतियां और भी हैं। ये बारहों की अलग अलग होती हैं, यों सब मिलाकर संक्षेप में बहत्तर प्रकृतियां हुईं॥१५०-१५७॥ अनन्तरमरिं विद्यादरिसेविनमेव च । अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनं तयोः परम् ॥ १५८ ॥ तान् सर्वानभिसंदध्यात्सामादिभिरुपक्रमैः । व्यस्तैश्चैव समस्तैश्च पौरुषेण नयेन च ॥ १५६ ॥
- कर आदि की आय, नौकरी में व्यय, नौकरों की चाल, विरुद्ध कार्यों को रोकना, मिथ्या व्यवहार रोकना, धर्मव्यवहार देखना, दण्ड देना, प्रायश्चित्त कराना, ये आठ कर्म हैं। † कापटिक, उदासीन, वैदेह, गृहपति, तापस, ये पाँच वर्ग हैं । ‡ विजिगीषु, अरि, अरिसेवित, अरिमित्र, पाष्णिग्राह, पार्ष्णिग्राहासार, मित्र, मित्र का मित्र, आक्रन्द, आक्रन्दासार, मध्यम और उदासीन । ३०