मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३६ मनुस्मृति । किसी किसी प्रदेश में यह 'विशेष' है कि बालक के पिता के भगिनीपति या जामाता आदि ही गायत्री का उपदेश किया करते हैं और वे 'मान्य' शब्द से पुकारे जाते हैं। कहीं कहीं कुलगुरु कान फूंका करते हैं, वे चाहे गायत्री से परिचित हों वा अपरिचित । और यही दशा उन मान्यधुरंधरों की भी है। किसी मौके पर यहां तक नौबत गुजरती है कि 'रामनाम' सुना दिया गया। क्या इससे भी गायत्री बड़ी है ! हरे हरे, ऐसा अँधियारा छा गया। देखो 'रामनाम' बड़ा पदार्थ है, इसमें कोई शक नहीं पर 'गायत्री' भी वह पदार्थ है जिसकी पाबन्दी वर्णाश्रम श्रृंखला में बँधकर रामजी ने भी की थी। और ऐसा भी देखने में आया है कि जिन लड़कों के माता पिता सामान्य हैं, या विवाह की राह देख रहे हैं, या लापरवाह हैं उनके दश, बीस, पचास, सौ लड़कों को एकत्र करके कोई कोई साहसिक धनी एकदम जनेऊ करा डालते हैं। यह ताण्डव प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक पांच सात ब्राह्मणों से खतम होता है........इत्यादि । लड़कों के पिता लोग 'गोत्र, प्रवर' से अपरिचित रहते हैं, ऐसी दशा में संध्या-तर्पण की तो बात ही क्या है ? कोई गोत्र से परिचित भी रहते हैं पर 'प्रवर' से अपरिचित रहते हैं। कोई गोत्र से परिचित होकर भी गोत्र का व्यवहार नहीं करते हैं, किंतु गोत्र की जगह 'गोत' एक निराला ही पदार्थ मानते हैं और उस गोत ही से विवाह-संबंध करते हैं। ऐसी दशा में 'सगोत्रा' तथा 'समानप्रवरा' कन्या से विवाह करने में कितना बड़ा दोष है यह बात धर्मशास्त्र या लोक- १ परिणीय सगोत्रां तु समानप्रवरां तथा। त्यागं कुर्याद्द्विजस्तस्यास्ततश्चान्द्रायणं चरेत् ॥