Skip to content
BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 39 of 649

Read in context
Page 39

भूमिका । ३७ व्यवहार से छिपी नहीं है। यह केवल मूर्खों ही की कथा नहीं है किंतु विद्वानों की भी है और उनको समाधान भी मिलता ही जाता होगा। बाक़ी रहे क्षत्रिय और वैश्य; उनको क्या कहा जावे ? ब्राह्मणों को चारा देते हैं, तो भी 'दोषा वाच्या गुरोरपि' इस न्याय का आश्रय लेकर कुछ कहा जाता है क्योंकि याज्य होने से धर्मशास्त्रानुसार उनके ऊपर ब्राह्मणों का अधिकार पुश्तैनी है। दुःख का विषय है कि क्षत्रिय और वैश्य जाति से जनेऊ का व्यवहार उठ सा गया। कई घराने तो ऐसें मिलेंगे कि उनमें से यदि किसी एक बूढ़े को पूछा जावै कि आपके पुरुषों में किसका जनेऊ हुआ था तो देखना तो दूर है पर सुनने का भी पता न चलेगा। कई घराने में किसी क़दर जनेऊ होता भी है तो और घरानों के साथ खान् पान संबंध होने से गजस्नान के समान उसका होना न होना बरा- बर है। दूसरी यह बात है कि छोटे छोटे क्षत्रिय तथा वैश्य विवाह आदि संबंधों के कारण बड़ों के अधीन हो रहे हैं और बड़े तो बड़े ही हैं जिनमें बहुतेरे क्षत्रियों की उपभोग- सामग्री महंमदियों की सी है और बहुतेरे वैश्यों का आचार जैनों का सा है इसीलिये 'कलावाद्यन्तयोः स्थितिः' यह कहना कई अंशों में यथार्थ हो गया है। और जो ब्राह्मणों के प्रभाव से तथा अपने अपने अज्ञान से नवीन-त्रैवर्णिक जाति बनती जाती है उसके विचार की आवश्यकता नहीं है। चातु- र्वर्ण्यशिक्षा में कहा है—