मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३८४ मनुस्मृति । निगृह्य दापयेच्चैनं समयव्यभिचारिणम् । चतुःसुवर्णान् षण्णिष्काञ्छतमानं च राजतम् ॥२२०॥ एतद्दण्डविधिं कुर्याद्धार्मिकः पृथिवीपतिः । ग्रामजातिसमूहेषु समयव्यभिचारिणाम् ॥ २२१ ॥ प्रतिज्ञाभङ्ग-इकरार तोड़ना । जो मनुष्य गाँव या देश के लोगों से किसी काम के लिए सत्य- प्रतिज्ञा करके लोभ से उसको छोड़ देवे तो राजा उसको राज्य से निकाल दे और उस नियमभङ्ग करनेवाले को पकड़कर चार निष्क वा छः सुवर्ण या एक चांदी का शतमान दण्ड करे । धार्मिक राजा गाँव या जातिमण्डल में प्रतिज्ञाभङ्ग करनेवाले को इस भांति दण्ड करे ॥ २१६-२२१ ॥ क्रीत्वा विक्रीय वा किञ्चिद्यस्येहानुशयो भवेत् । सोऽन्तर्दशाहात्तद्द्रव्यं दद्याच्चैवाददीत च ॥ २२२ ॥ परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नापि दापयेत् । आददानो ददच्चैव राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥ २२३ ॥ किसी वस्तु को खरीद वा बेंचकर जिसको पसंद न हो वह दश दिन के भीतर उसको वापस कर दे या लेवे । परन्तु दश दिन के बाद न वापस करे न करावे । क्योंकि समय-भङ्ग करने से ६०० पण दण्ड उस पर किया जायगा ॥ २२२-२२३ ॥ यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति । तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान् ॥२२४॥ अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद् द्वेषेण मानवः । स शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन् ॥ २२५ ॥