मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 425 of 649
Read in context· आठवां अध्याय । २८५ पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाकन्यासु कचित्नॄणां लुप्तधर्मक्रिया हि ताः॥२२६॥ पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् । तेषां निष्ठा त विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ॥ २२७ ॥ यस्मिन् यस्मिन् कृते कार्ये यस्येहानुशयो भवेत् । तमनेन विधानेन धर्म्ये पथि निवेशयेत् ॥ २२८ ॥ जो पुरुष दोषवाली कन्या के दोष बिना बतलाए विवाह करदे उसपर राजा ९६ पण दण्ड करे। किसी ईर्षा से कन्या में दोष लगावे, पर उसको न दिखलावे तो उस पर सौ १०० पण दण्ड करे। विवाहसम्बन्धी वैदिक मन्त्र कन्याओं के लिए ही कहे हैं जो कन्या नहीं हैं उनके लिए नहीं क्योंकि उनका कन्यापन लोप होगया। विवाह के मन्त्र कन्या में स्त्रीत्व लाते हैं और उन मन्त्रों की समाप्ति सप्तपदी हो जाने पर होती है-ऐसा धर्मशास्त्रियों का निर्णय है। इस जगत् में जिस जिस काम के करने पर जिसको अफ़सोस पैदा होउसका निर्णयकही रीति से राजा करे॥२२४-२२८॥ पशुषु स्वामिनां चैव पालानां च व्यतिक्रमे । विवादं संप्रवक्ष्यामि यथावद्धर्मतत्त्वतः ॥ २२६ ॥ दिवा वक्तव्यता पाले रात्रौ स्वामिनि तद्गृहे । योगक्षेमेऽन्यथा चेत्तु पालो वक्तव्यतामियात्॥ २३०॥ गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्याद्दशतोऽवराम् । गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यात्पालेऽभृते भृतिः॥२३१॥ पशु के मालिक और चरवाह में प्रतिज्ञाभङ्ग होने पर इस प्रकार निर्णय करे-पशुओं की रक्षा का भार दिन में चरवाह और रात में उनके मालिक पर है और चारे की कमी पर चरवाह उत्तर-