मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 47 of 649
Read in contextभूमिका । ४५ आदि सूत्रों के अनुसार कृष्णयजुर्वेदियों के कर्म; गोभिल- कौथुम आदि सूत्रों के अनुसार सामवेदियों के कर्म और शौनक सूत्रानुसार अथर्ववेदियों के कर्म होते हैं। और यह स्मरण रहे कि सर्वत्र स्मार्तकर्म में स्मार्तसूत्र और श्रौतकर्म में श्रौतसूत्र ही शरण हैं। शाखा-सूत्र के विस्मरण में वा उच्छेद में अन्यान्य स्मृतियों का शरण लेना यह अगतिक गति है। एवं, प्रेतकर्म में गरुड़पुराण का शरण लेना भी अपनी अपनी गृह्यस्मृति के अभावदशा में है। क्योंकि प्रायः पुराणों में सर्वशाखीय कर्मों का निरूपण है इस कारण पौराणिक-कर्म लेने से गृह्यस्मृति का अनादर होता है वह सर्वथा विरुद्ध है। प्रेतकर्म-श्राद्ध । मरीचि ने कहा है— ' प्रेतं पितॄंश्च निर्दिश्य भोज्यं यत् प्रियमात्मनः । श्रद्धया दीयते यत्तु तच्छ्राद्धं परिकीर्तितम् ॥ ' मृतपित्रादि 'सपिण्डीकरण' श्राद्ध के पहिले "प्रेत = प्र + इत " शब्द से कहे जाते हैं। मृतपित्रादिकों के उद्देश्य से जो आत्मप्रिय भोजनादि ब्राह्मण को श्रद्धा से दिया जावे वह 'श्राद्ध' कहलाता है। श्राद्ध चार प्रकार का है-एकोद्दिष्ट, सपिण्डन; पार्वण और नान्दी। एकोद्दिष्ट तीन प्रकार का है—नव, नवमिश्र और पुराण। (१) मरण दिन से लेकर दशवें दिन तक जो श्राद्ध कहे हैं वे 'नव' हैं। (२) एकादशाहादि ऊनवार्षिक पर्यन्त श्राद्ध 'नव- मिश्र' हैं। १ इस समय ब्राह्मण सपत्ति के अभाव से अपात्रक श्राद्ध ही बहुधा होता है।