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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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४६ मनुस्मृति ।

( ३ ) वार्षिकश्राद्ध 'पुराण' हैं । ( ४ ) बारहवें दिन का श्राद्ध ' सपिण्डन ' कहलाता है । जिसका यह स्वरूप है— ' पित्रर्घ्यपात्रापिण्डेषु मेलनं येन भाव्यते । प्रेतार्घ्यपिण्डयोस्तद्धि सपिण्डनमुदीर्यते ॥ ' और पित्रादि एक के उद्देश से एक पिण्डयुत विश्वेदेव- हीन जो श्राद्ध किया जाता है वह 'एकोद्दिष्ट ' है । ( ५ ) पित्रादि तीन पुरुष के उद्देश से जो श्राद्ध होता है— वह ' पार्वण ' है । ( ६ ) पुत्रजन्म, विवाह, अग्न्याधान, सोमयाग आदि शुभ कर्म के प्रारम्भ में जो श्राद्ध किया जाता है वह 'नान्दी' श्राद्ध कहलाता है । इन आवश्यक श्राद्धों से अतिरिक्त 'काम्य- श्राद्ध' हैं जो 'कात्यायनश्राद्धसूत्र' के नौमी कारिका में तथा याज्ञवल्क्यस्मृति आदि में लिखे हैं । उपसंहार । कतिपय आवश्यक विषयों का निरूपण करके कर्मकाण्ड समाप्त कियाजाता है । यह जरूर है कि धार्मिक क्रिया अनेक अंशों में अदृष्ट फलार्थ है, पर ऐसा भी नहीं है कि दृष्टफल न हो । विचार दृष्टि से गर्भाधानादि संस्कारों में दृष्टफल बहुत मिलेंगे जिनका क्षेत्र-बीज-फल पुष्टि के साथ घनिष्ट संबन्धहै। और यह भी जरूरहै कि क्रिया देश, काल, पात्र की अपेक्षा करती है, देश, काल, पात्र के संघटन के लिये अनेकानेक विधि हैं, उनके विघटन दशामें दोष उपस्थित होते हैं, विधि में दोष न उत्पन्न हों इसलिये अनेक निषेध वाक्य और दोषमार्जन के लिये अनेक उपाय हैं, बहुधा ये उपाय विषय विभाग से प्रायश्चित्त, शान्तिक, पौष्टिक शब्द से

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