मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context[Header] भूमिका । ४७
[Body] कहेजाते हैं । यह विषय यहां तक पहुँचा कि ऋषियों ने देश, काल, पात्र का संकोच देखकर 'विरोधे त्वनपेक्षं स्याद् असति ह्यनुमानम्' इस श्रुति प्राबल्य व्यवस्थापर विशेष दृष्टि न देकर लोकरक्षार्थ 'कलिवर्ज्य' प्रकरण बनाया । इधर स्वार्थान्ध लोगों ने संकीर्ण ग्रन्थों की बहुतायत करदी जिसका कलकल 'प्रत्यक्षीक्रियते-' पहिले लिखा जाचुकाहै । ऐसी कष्टदशा में 'अस्वर्ग्यं लोकविद्विष्टं धर्ममप्याचरेन्न तु' इस योगीश्वर के शिक्षानुसार अपने कल्पसूत्रोक्त श्रौत-स्मार्त कर्म धर्मसंरक्षणार्थ यथासंभव अवश्य कर्तव्य हैं । और बालकाल में होनेवाले संस्कारों पर माता पिता को बाद के संस्कारों पर स्वयं विचार करना जरूरी है । काल की महिमा से बहुतेरे पुरुष यह कहते हैं कि-हम संसारी हैं, नाक दबाकर बैठने का समय नहीं है-उन महाशयों से यह कहाजाता है कि विचार कीजिये चौबीस घंटेमें एकआध घंटेका समय सबको मिल सकता है, यदि आप अपनी तन्दुरुस्ती ठीक बना रक्खा चाहते हैं तो 'नाक दबाने' को वैद्य-हकीम-डाक्टर की दवा में शुमार कीजिये । और यों त्रैवर्णिकपनेकी लीक भी चलती रहेगी । यह अवश्य कहना पड़ेगा कि 'गृह्यस्मृति' के कुछ विषय बहुत बढ़े चढ़े नजर आने लगे बाक़ी-के लुप्त होगये, पहिले ऐसा न था। जबसे वैदिक ज्ञान लुप्तप्राय होगया स्वशाखीय वा परशाखीय कर्मों का बोध उठगया अत्यावश्यक, आवश्यक, अनावश्यक विषयों का विवेक डूब गया और वर्णाश्रमधर्म का अधरोत्तर भया। अज्ञान
[Footnote] १। कलिवर्ज्य का उल्लेख बहुत स्थलों में है। जैसा कि 'निर्णयसिन्धु' में तीसरे परिच्छेद के पूर्वार्ध के अन्त में। निबन्धग्रन्थों के उद्धृत वाक्यों को मूल ग्रन्थ से मिलाने की अत्यावश्यकता है ।