Skip to content
BharatKosha
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 204 of 1098

Read in context
Page 204
१९४* मत्स्यपुराण *

| स हि धर्मरथः श्रीमांस्तेन विष्णुपदे गिरौ।<br>सोमः शुक्रेण वै राज्ञा सह पीतो महात्मना॥ ९३<br>अथ धर्मरथस्याभूत् पुत्रश्चित्ररथः किल।<br>तस्य सत्यरथः पुत्रस्तस्माद् दशरथः किल॥ ९४<br>लोमपाद इति ख्यातस्तस्य शान्ता सुताभवत्।<br>अथ दाशरथिर्वीरश्चतुरङ्गो महायशाः॥ ९५<br>ऋष्यशृङ्गप्रसादेन जज्ञे स्वकुलवर्धनः।<br>चतुरङ्गस्य पुत्रस्तु पृथुलाक्ष इति स्मृतः॥ ९६<br>पृथुलाक्षसुतश्चापि चम्पनामा बभूव ह।<br>चम्पस्य तु पुरी चम्पा पूर्वं या मालिनी भवत्॥ ९७<br>पूर्णभद्रप्रसादेन हर्यङ्गोऽस्य सुतोऽभवत्।<br>यज्ञे विभाण्डकाच्चास्य वारणः शत्रुवारणः॥ ९८<br>अवतारयामास महीं मन्त्रैर्वाहनमुत्तमम्।<br>हर्यङ्गस्य तु दायादो जातो भद्ररथः किल॥ ९९<br>अथ भद्ररथस्यासीद् बृहत्कर्मा जनेश्वरः।<br>बृहद्भानुः सुतस्तस्य तस्माज्जज्ञे महात्मवान्॥ १००<br>बृहन्मनास्तु राजेन्द्रो जनयामास वै सुतम्।<br>नाम्ना जयद्रथं नाम तस्माद् बृहद्रथो नृपः॥ १०१<br>आसीद् बृहद्रथाच्चैव विश्वजिज्जनमेजयः।<br>दायादस्तस्य चाङ्गो वै तस्मात् कर्णोऽभवन्नृपः॥ १०२<br>कर्णस्य वृषसेनस्तु पृथुसेनस्तथात्मजः।<br>एतेऽङ्गस्यात्मजाः सर्वे राजानः कीर्तिता मया।<br>विस्तरेणानुपूर्व्याच्च पुरोस्तु शृणुत द्विजाः॥ १०३ | | | ऋषय ऊचुः<br>कथं सूतात्मजः कर्णः कथमङ्गस्य चात्मजः।<br>एतदिच्छामहे श्रोतुमत्यन्तकुशलो ह्यसि॥ १०४ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! कर्ण कैसे अधिरथ सूतके पुत्र थे, पुनः किस प्रकार अङ्गके पुत्र कहलाये? इस रहस्यको सुननेकी हम लोगोंकी उत्कट इच्छा है, इसका वर्णन कीजिये; क्योंकि आप कथा कहनेमें परम प्रवीण हैं॥ १०४॥ | | सूत उवाच<br>बृहद्भानुसुतो जज्ञे राजा नाम्ना बृहन्मनाः।<br>तस्य पत्नीद्वयं ह्यासीच्छैब्यस्य तनये ह्युभे।<br>यशोदेवी च सत्या च तयोर्वंशं च मे शृणु॥ १०५<br>जयद्रथं तु राजानं यशोदेवी व्यजीजनत्।<br>सा बृहन्मनसः सत्या विजयं नाम विश्रुतम्॥ १०६<br>विजयस्य बृहत्पुत्रस्तस्य पुत्रो बृहद्रथः।<br>बृहद्रथस्य पुत्रस्तु सत्यकर्मा महामनाः॥ १०७<br>सत्यकर्मणोऽधिरथः सूतश्चाधिरथः स्मृतः।<br>यः कर्णं प्रतिजग्राह तेन कर्णस्तु सूतजः।<br>तच्चेदं सर्वमाख्यातं कर्णं प्रति यथोदितम्॥ १०८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! बृहद्भानुका पुत्र बृहन्मना नामका राजा हुआ। उसके दो पत्नियाँ थीं। वे दोनों शैब्यकी कन्याएँ थीं। उनका नाम यशोदेवी और सत्या था। अब मुझसे उन दोनोंका वंश-वर्णन सुनिये। बृहन्मनाके संयोगसे यशोदेवीने राजा जयद्रथको और सत्याने विश्वविख्यात विजयको जन्म दिया था। विजयका पुत्र बृहत्पुत्र और उसका पुत्र बृहद्रथ हुआ। बृहद्रथका पुत्र महामना सत्यकर्मा हुआ। सत्यकर्माका पुत्र अधिरथ हुआ। यही अधिरथ सूत नामसे भी विख्यात था, जिसने (गङ्गामें बहते हुए) कर्णको पकड़ा था। इसी कारण कर्ण सूत-पुत्र कहे जाते हैं। इस प्रकार कर्णके प्रति जो किंवदन्ती फैली है, उसे पूर्णतया मैंने आप लोगोंसे कह दिया॥ १०५—१०८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशेऽष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४८॥

मत्स्य महापुराण · Page 204 of 1098 · BharatKosha