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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 203 of 1098

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Page 203

* अध्याय ४८ * । १९३

| भविष्यन्ति कुमारास्तु पञ्च देवसुतोपमाः।<br>तेजस्विनः सुवृत्ताश्च यज्वानो धार्मिकाश्च ते॥ ७६<br><br>सूत उवाच<br>तदंशस्तु सुदेष्णाया ज्येष्ठः पुत्रो व्यजायत।<br>अङ्गस्तथा कलिङ्गश्च पुण्ड्रः सुहास्तथैव च॥ ७७<br>वङ्गराजस्तु पञ्चैते बलेः पुत्राश्च क्षेत्रजाः।<br>यस्यैते दीर्घतमसा बलेर्दत्ताः सुतास्तथा॥ ७८<br>प्रतिष्ठामागतानां हि ब्राह्मण्यं कार्यंस्ततः।<br>ततो मानुषयोन्यां स जनयामास वै प्रजाः॥ ७९<br>ततस्तं दीर्घतमसं सुरभिर्वाक्यमब्रवीत्।<br>विचार्य यस्माद् गोधर्मं प्रमाणं ते कृतं विभो॥ ८०<br>भक्त्या चानन्ययास्मासु तेन प्रीतास्मि तेऽनघ।<br>तस्मात् तुभ्यं तमो दीर्घमाघ्रायापनुदामि वै॥ ८१<br>बार्हस्पत्यस्तथैवैष पाप्मा वै तिष्ठति त्वयि।<br>जरां मृत्युं तमश्चैव आघ्रायापनुदामि ते॥ ८२<br>सद्यः स घ्रातमात्रस्तु अभितो मुनिसत्तमः।<br>आयुष्मांश्च वपुष्मांश्च चक्षुष्मांश्च ततोऽभवत्॥ ८३<br>गोऽभ्याहते तमसि वै गौतमस्तु ततोऽभवत्।<br>कक्षीवांस्तु ततो गत्वा सह पित्रा गिरिव्रजम्॥ ८४<br>दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा पितुर्वै स ह्युपविष्टश्चिरं तपः।<br>ततः कालेन महता तपसा भावितस्तु सः॥ ८५<br>विधूय मातृजं कायं ब्राह्मणं प्राप्तवान् प्रभुः।<br>ततोऽब्रवीत् पिता तं वै पुत्रवानस्म्यहं त्वया॥ ८६<br>सत्पुत्रेण तु धर्मज्ञ कृतार्थोऽहं यशस्विना।<br>मुक्त्वाऽऽत्मानं ततोऽसौ वै प्राप्तवान् ब्रह्मणः क्षयम्॥ ८७<br>ब्राह्मण्यं प्राप्य काक्षीवान् सहस्रमसृजत् सुतान्।<br>कौष्माण्डा गौतमाश्चैव स्मृताः काक्षीवतः सुताः॥ ८८<br>इत्येष दीर्घतमसो बलेर्वैरोचनस्य च।<br>समागमो वः कथितः सन्ततिश्चोभयोस्तथा॥ ८९<br>बलिस्तानभिनन्द्याह पञ्च पुत्रानकल्मषान्।<br>कृतार्थः सोऽपि धर्मात्मा योगमायावृतः स्वयम्॥ ९०<br>अदृश्यः सर्वभूतानां कालापेक्षः स वै प्रभुः।<br>तत्राङ्गस्य तु दायादो राजासीद् दधिवाहनः॥ ९१<br>दधिवाहनपुत्रस्तु राजा दिविरथः स्मृतः।<br>आसीद् दिविरथापत्यं विद्वान् धर्मरथो नृपः॥ ९२ | दशरथका पुत्र महायशस्वी शूरवीर चतुरङ्ग हुआ।<br><br>चतुरङ्गका पुत्र पृथुलाक्ष नामसे प्रसिद्ध हुआ। अपने कुलकी वृद्धि करनेवाला यह पृथुलाक्ष महर्षि ऋष्यशृङ्गकी कृपासे पैदा हुआ था। पृथुलाक्षके चम्प नामक पुत्र हुआ। चम्पकी राजधानीका नाम चम्पा (भागलपुर) था, जो पहले मालिनी नामसे प्रसिद्ध थी। पूर्णभद्रकी कृपासे चम्पका पुत्र हर्यङ्ग हुआ। इस राजाके यज्ञमें महर्षि विभाण्डकने मन्त्रोंद्वारा एक ऐसे हस्तीको भूतलपर अवतीर्ण किया था जो शत्रुओंको विमुख कर देनेवाला एवं उत्तम वाहन था। हर्यङ्गका पुत्र भद्ररथ पैदा हुआ। भद्ररथका पुत्र राजा बृहत्कर्मा हुआ। उसका पुत्र बृहद्भानु हुआ। उससे महात्मवान्‌का जन्म हुआ। राजेन्द्र बृहद्भानुने एक अन्य पुत्रको भी उत्पन्न किया था जिसका नाम जयद्रथ था। उससे राजा बृहद्रथका जन्म हुआ। बृहद्रथसे विश्वविजयी जनमेजय पैदा हुआ था। उसका पुत्र अङ्ग था और उससे राजा कर्णकी उत्पत्ति हुई थी। कर्णका वृषसेन और उसका पुत्र पृथुसेन हुआ। द्विजवरो! ये सभी राजा अङ्गके वंशमें उत्पन्न हुए थे, मैंने इनका आनुपूर्वी विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया। अब आप लोग पूरुके वंशका वर्णन सुनिये॥ ९०—१०३॥ |