मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
Page 45 of 1098
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| * अध्याय ७ * | ३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यः कुर्याद् विधिनानेन मदनद्वादशीमिमाम्।<br>स सर्वपापनिर्मुक्तः प्राप्नोति हरिसाम्यताम्॥ २७<br><br>इह लोके वरान् पुत्रान् सौभाग्यफलमश्नुते।<br>यः स्मरः संस्मृतो विष्णुरानन्दात्मा महेश्वरः॥ २८<br><br>सुखार्थी कामरूपेण स्मरेदङ्गेशमीश्वरम्।<br>एतच्छ्रुत्वा चकारासौ दितिः सर्वमशेषतः॥ २९ | जो इस विधिके अनुसार इस मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुकी समताको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्तकर सौभाग्य-फलका उपभोग करता है। जो स्मर, आनन्दात्मा, विष्णु और महेश्वरनामसे कहे गये हैं, उन्हीं अङ्गेश भगवान् विष्णुका सुखार्थीको स्मरण करना चाहिये। यह सुनकर दितिने सारा कार्य यथावत्-रूपसे सम्पन्न किया (अर्थात् मदनद्वादशीव्रतका अनुष्ठान किया)॥ २१—२९॥ |
| कश्यपो व्रतमाहात्म्यादागत्य परया मुदा।<br>चकार कर्कशां भूयो रूपयौवनशालिनीम्॥ ३०<br><br>वरेणच्छन्दयामास सा तु वव्रे ततो वरम्।<br>पुत्रं शक्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्॥ ३१<br><br>वरयामि महात्मानं सर्वामरनिषूदनम्।<br>उवाच कश्यपो वाक्यमिन्द्रहन्तारमूर्जितम्॥ ३२<br><br>प्रदास्याम्यहमेवेह किंत्वेतत् क्रियतां शुभे।<br>आपस्तम्बः करोत्विष्टिं पुत्रीयामद्य सुव्रते॥ ३३<br><br>विधास्यामि ततो गर्भमिन्द्रशत्रुनिषूदनम्।<br>आपस्तम्बस्ततश्चक्रे पुत्रेष्टिं द्रविणाधिकाम्॥ ३४<br><br>इन्द्रशत्रुर्भवस्वेति जुहाव च सविस्तरम्।<br>देवा मुमुदिरे दैत्या विमुखाः स्युश्च दानवाः॥ ३५ | दितिके उस व्रतानुष्ठानके प्रभावसे प्रभावित होकर महर्षि कश्यप उसके निकट पधारे और परम प्रसन्नता-पूर्वक उन्होंने उसे पुनः रूप-यौवनसे सम्पन्न नवयुवती बना दिया तथा वर माँगनेको कहा। तब वर माँगनेके लिये उद्यत हुई दितिने कहा—'पतिदेव! मैं आपसे एक ऐसे पुत्रका वरदान चाहती हूँ, जो इन्द्रका वध करनेमें समर्थ, अमित पराक्रमी, महान् आत्मबलसे सम्पन्न और समस्त देवताओंका विनाशक हो।' यह सुनकर महर्षि कश्यपने उससे ऐसी बात कही—'शुभे! मैं तुम्हें अत्यन्त ऊर्जस्वी एवं इन्द्रका वध करनेवाला पुत्र प्रदान करूँगा, किंतु इस विषयमें तुम यह काम करो कि आपस्तम्ब ऋषिसे प्रार्थना करके उनके द्वारा आज ही पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान कराओ। सुव्रते! यज्ञकी समाप्ति होनेपर मैं (तुम्हारे उदरमें) इन्द्ररूपी शत्रुके विनाशक पुत्रका गर्भाधान करूँगा।' तत्पश्चात् महर्षि आपस्तम्बने उस अत्यन्त खर्चीले पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस समय उन्होंने 'इन्द्रशत्रुर्भवस्व—इन्द्रका शत्रु उत्पन्न हो'—इस मन्त्रसे विस्तारपूर्वक अग्निमें आहुति दी। (इस यज्ञसे देवताओंको रुष्ट होना चाहता था, परंतु) वे यह जानकर प्रसन्न हुए कि दैत्यों और दानवोंको इस यज्ञफलसे विमुख होना पड़ेगा॥ ३०—३५॥ |
| दित्यां गर्भमथाधत्त कश्यपः प्राह तां पुनः।<br>त्वया यत्नो विधातव्यो ह्यस्मिन् गर्भे वरानने॥ ३६<br><br>संवत्सरशतं त्वेकमस्मिन्नेव तपोवने।<br>संध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि॥ ३७<br><br>न स्थातव्यं न गन्तव्यं वृक्षमूलेषु सर्वदा।<br>नोपस्करेषूपविशेन्मुसलोलूखलादिषु ॥ ३८<br><br>जले च नावगाहेत शून्यागारं च वर्जयेत्।<br>वल्मीकायां न तिष्ठेत न चोद्विग्नमना भवेत्॥ ३९<br><br>विलिखेन्न नखैर्भूमिं नाङ्गारेण न भस्मना।<br>न शयालुः सदा तिष्ठेद् व्यायामं च विवर्जयेत्॥ ४०<br><br>न तुषाङ्गारभस्मास्थिकपालेषु समाविशेत्।<br>वर्जयेत् कलहं लोकैर्गात्रभङ्गं तथैव च॥ ४१ | (यज्ञकी समाप्तिके बाद) कश्यपने दितिके उदरमें गर्भाधान किया और पुनः उससे कहा—'वरानने! एक सौ वर्षोंतक तुम्हें इसी तपोवनमें रहना है और इस गर्भकी रक्षाके लिये प्रयत्न करना है। वरवर्णिनि! गर्भिणी स्त्रीको संध्याकालमें भोजन नहीं करना चाहिये। उसे न तो कभी वृक्षके मूलपर बैठना चाहिये, न उसके निकट ही जाना चाहिये। वह घरकी सामग्री मूसल, ओखली आदिपर न बैठे, जलमें घुसकर स्नान न करे, सुनसान घरमें न जाय, बिमवटपर न बैठे, मनको उद्विग्न न करे, नखसे, लुआठीसे अथवा राखसे पृथ्वीपर रेखा न खींचे, सदा नींदमें अलसायी हुई न रहे, कठिन परिश्रमका काम न करे, भूसी, लुआठी, भस्म, हड्डी और खोपड़ीपर न बैठे, लोगोंके साथ वाद-विवाद न करे |