मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| न मुक्तकेशा तिष्ठेत नाशुचिः स्यात् कदाचन।<br>न शयीतोत्तरशिरा न चापरेशिराः क्वचित् ॥ ४२<br>न वस्त्रहीना नोद्विग्ना न चार्द्रचरणा सती।<br>नामङ्गल्यां वदेद् वाचं न च हास्याधिका भवेत् ॥ ४३<br>कुर्यात्तु गुरुशुश्रूषां नित्यं माङ्गल्यतत्परा।<br>सर्वौषधीभिः कोष्णेन वारिणा स्नानमाचरेत् ॥ ४४<br>कृतरक्षा सुभूषा च वास्तुपूजनतत्परा।<br>तिष्ठेत् प्रसन्नवदना भर्तुः प्रियहिते रता ॥ ४५<br>दानशीला तृतीयायां पार्वण्यं नक्तमाचरेत्।<br>इतिवृत्ता भवेन्नारी विशेषेण तु गर्भिणी ॥ ४६<br>यस्तु तस्या भवेत् पुत्रः शीलायुर्वृद्धिसंयुतः।<br>अन्यथा गर्भपतनमवाप्नोति न संशयः ॥ ४७<br>तस्मात्त्वमनया वृत्त्या गर्भेऽस्मिन् यत्नमाचर।<br>स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि तथेत्युक्तस्तया पुनः ॥ ४८<br>पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>ततः सा कश्यपोक्तेन विधिना समतिष्ठत ॥ ४९ | और शरीरको तोड़े-मरोड़े नहीं। वह बाल खोलकर न बैठे, कभी अपवित्र न रहे, उत्तर दिशामें सिरहाना करके एवं कहीं भी नीचे सिर करके न सोये, न नंगी होकर, न उद्विग्नचित्त होकर एवं न भीगे चरणोंसे ही कभी शयन करे, अमङ्गलसूचक वाणी न बोले, अधिक जोरसे हँसे नहीं, नित्य माङ्गलिक कार्योंमें तत्पर रहकर गुरुजनोंकी सेवा करे और (आयुर्वेदद्वारा गर्भिणीके स्वास्थ्यके लिये उपयुक्त बतलायी गयी) सम्पूर्ण ओषधियोंसे युक्त गुनगुने गरम जलसे स्नान करे। वह अपनी रक्षाका ध्यान रखे, स्वच्छ वेष-भूषासे युक्त रहे, वास्तु-पूजनमें तत्पर रहे, प्रसन्नमुखी होकर सदा पतिके हितमें संलग्न रहे, तृतीया तिथिको दान करे, पर्व-सम्बन्धी व्रत एवं नक्तव्रतका पालन करे। जो गर्भिणी स्त्री विशेषरूपसे इन नियमोंका पालन करती है, उसका उस गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह शीलवान् एवं दीर्घायु होता है। इन नियमोंका पालन न करनेपर निस्संदेह गर्भपातकी आशङ्का बनी रहती है। प्रिये! इसलिये तुम इन नियमोंका पालन करके इस गर्भकी रक्षाका प्रयत्न करो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जा रहा हूँ।' दितिके द्वारा पतिकी आज्ञा स्वीकार कर लेनेपर महर्षि कश्यप वहीं सभी जीवोंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। तब दिति महर्षि कश्यपद्वारा बताये गये नियमोंका पालन करती हुई समय व्यतीत करने लगी॥ ३६–४९॥ |
| अथ भीतस्तथेन्द्रोऽपि दितेः पार्श्वमुपागतः।<br>विहाय देवसदनं तच्छुश्रूषुरवस्थितः ॥ ५०<br>दितिश्छिद्रान्तरप्रेप्सुरभवत् पाकशासनः।<br>विनीतोऽभवद्व्यग्रः प्रशान्तवदनो बहिः ॥ ५१<br>अजानन् किल तत्कार्यमात्मनः शुभमाचरन्।<br>ततो वर्षशतान्ते सा न्यूने तु दिवसैस्त्रिभिः ॥ ५२<br>मेने कृतार्थमात्मानं प्रीत्या विस्मितमानसा।<br>अकृत्वा पादयोः शौचं प्रसुप्ता मुक्तमूर्धजा ॥ ५३<br>निद्राभरसमाक्रान्ता दिवापरशिराः क्वचित्।<br>ततस्तदन्तरं लब्ध्वा प्रविष्टस्तु शचीपतिः ॥ ५४<br>वज्रेण सप्तधा चक्रे तं गर्भं त्रिदशाधिपः।<br>ततः सप्तैव ते जाताः कुमाराः सूर्यवर्चसः ॥ ५५<br>रुदन्तः सप्त ते बाला निषिद्धा गिरिदारिणा।<br>भूयोऽपि रुदतश्चैतानेकैकं सप्तधा हरिः ॥ ५६ | (इस कार्यकलापकी सूचना पानेपर) इन्द्र भयभीत हो उठे और तुरन्त देवलोकको छोड़कर दितिके निकट आ पहुँचे। वे दितिकी सेवा करनेकी इच्छासे उसके समीप ही रहने लगे। इन्द्र सदा दितिके छिद्रान्वेषणमें ही लगे रहे। ऊपरसे तो वे विनम्र, प्रशान्त और प्रसन्न मुखवाले दीखते थे, परंतु भीतरसे वे दितिके कार्योंकी कुछ परवाह न करके सदा अपने ही हित-साधनमें दत्तचित्त रहते थे। इस प्रकार सौ वर्षोंकी समाप्तिमें जब तीन दिन शेष रह गये, तब दिति प्रसन्नतापूर्वक अपनेको सफलमनोरथ मानने लगी। उस समय आश्चर्यसे युक्त मनवाली दिति नींदके आलस्यसे आक्रान्त होकर पैरोंको बिना धोये बाल खोलकर सिरको नीचे किये कहीं दिनमें ही सो गयी। तब दितिकी उस त्रुटिको पाकर शचीके प्राणपति देवराज इन्द्र उसके उदरमें प्रवेश कर गये और अपने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर दिये। उन टुकड़ोंसे सूर्यके समान तेजस्वी सात शिशु उत्पन्न हो गये। वे रोने लगे। रोते हुए उन सातों शिशुओंको |