मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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[ ५ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| २३- | चन्द्रमाकी उत्पत्ति, उनका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंके साथ विवाह, चन्द्रमाद्वारा राजसूययज्ञका अनुष्ठान, उनकी तारापर आसक्ति, उनका भगवान् शङ्करके साथ युद्ध तथा ब्रह्माजीका बीच-बचाव करके युद्ध शान्त करना | ९० |
| २४- | ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त | ९४ |
| २५- | कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना | ९९ |
| २६- | देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना | १०५ |
| २७- | देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप | १०८ |
| २८- | शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष | १११ |
| २९- | शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको सन्तुष्ट करना | ११२ |
| ३०- | सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह | ११५ |
| ३१- | ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म | ११९ |
| ३२- | देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना | १२१ |
| ३३- | ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना | १२५ |
| ३४- | राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना | १२८ |
| ३५- | वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति | १३० |
| ३६- | इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना | १३२ |
| ३७- | ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना | १३४ |
| ३८- | ययाति और अष्टकका संवाद | १३५ |
| ३९- | अष्टक और ययातिका संवाद | १३८ |
| ४०- | ययाति और अष्टकका आश्रमधर्म-सम्बन्धी संवाद | १४२ |
| ४१- | अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना | १४४ |
| ४२- | राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना | १४६ |
| ४३- | ययाति-वंश-वर्णन, यदुवंशका वृत्तान्त तथा कार्तवीर्य अर्जुनकी कथा | १५० |
| ४४- | कार्तवीर्यका आदित्यके तेजसे सम्पन्न होकर वृक्षोंको जलाना, महर्षि आपवद्वारा कार्तवीर्यको शाप और क्रोष्टुके वंशका वर्णन | १५४ |
| ४५- | वृष्णिवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें स्यमन्तक-मणिकी कथा | १६० |
| ४६- | वृष्णि-वंशका वर्णन | १६३ |
| ४७- | श्रीकृष्ण-चरित्रका वर्णन, दैत्योंका |