मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| * अध्याय १७१ * | ७०५ |
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| दत्ता भद्राय धर्माय ब्रह्मणा दृष्टकर्मणा।<br>या तु रूपवती पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी॥ ३४<br>सुरभिः सा हिता भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता।<br>ततस्तामगमद् ब्रह्मा मैथुनं लोकपूजितः॥ ३५<br>लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय सत्तमः।<br>जज्ञिरे च सुतास्तस्यां विपुला धूमसन्निभाः॥ ३६<br>नक्तंसन्ध्याभ्रसङ्काशा प्रादहंस्तिग्मतेजसः।<br>ते रुदन्तो द्रवन्तश्च गर्हयन्तः पितामहम्॥ ३७<br>रोदनाद् द्रवणाच्चैव रुद्रा इति ततः स्मृताः।<br>निर्ऋतिश्चैव शम्भुवैं तृतीयश्चापराजितः॥ ३८<br>मृगव्याधः कपर्दी च दहनोऽथेश्वरश्च वै।<br>अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपाली चापि पिङ्गलः॥ ३९<br>सेनानीश्च महातेजा रुद्रास्त्वेकादश स्मृताः।<br>तस्यामेव सुरभ्यां च गावो यज्ञेश्वराश्च वै॥ ४०<br>प्रकृष्टाश्च तथा मायाः सुरभ्याः पशवोऽक्षराः।<br>अजाश्चैव तु हंसाश्च तथैवामृतमुत्तमम्॥ ४१<br>ओषध्यः प्रवरायाश्च सुरभ्यास्ताः समुत्थिताः।<br>धर्माल्लक्ष्मीस्तथा कामं साध्या साध्यान् व्यजायत॥ ४२<br>भवं च प्रभवं चैव हीशं चासुरहं तथा।<br>अरुणं चारुणिं चैव विश्वावसुबलध्रुवान्॥ ४३<br>हविष्यं च वितानं च विधानशमितावपि।<br>वत्सरं चैव भूतिं च सर्वासुरनिषूदनम्॥ ४४<br>सुपर्वाणं बृहत्कान्तिः साध्या लोकनमस्कृता।<br>तमेवानुगता देवी जनयामास वै सुरान्॥ ४५<br>वरं वै प्रथमं दैवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम्।<br>विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरम्॥ ४६<br>ततोऽनुरूपमायं च यमस्तस्मादनन्तरम्।<br>सप्तमं च तथा वायुमष्टमं निर्ऋतं वसुम्॥ ४७<br>धर्मस्यापत्यमेतद् वै सुदेव्यां समजायत।<br>विश्वे देवाश्च विश्वायां धर्माज्जाता इति श्रुतिः॥ ४८<br>दक्षश्चैव महाबाहुः पुष्करस्वन एव च।<br>चाक्षुषस्तु मनुश्चैव तथा मधुमहोरगौ॥ ४९<br>विश्रान्तकवपुर्बालो विष्कम्भश्च महायशाः।<br>गरुडश्चातिसत्त्वौजा भास्करप्रतिमद्युतिः॥ ५०<br>विश्वान् देवान् देवमाता विश्वेशाजनयत् सुतान्। | इसी बीच ब्रह्माकी स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एवं हितकारिणी सुन्दरी पत्नी सुरभिका रूप धारण कर ब्रह्माके निकट उपस्थित हुई। तब लोक-सृष्टिके कारणोंके ज्ञाता लोकपूजित देवश्रेष्ठ ब्रह्माने गौओंकी उत्पत्तिके निमित्त उसके साथ मानसिक समागम किया। उससे धूमकी-सी कान्तिवाले विशालकाय पुत्र उत्पन्न हुए। उनका वर्ण रात्रि और संध्याके संयोगकालमें छाये हुए बादलोंके समान था। वे अपने प्रचण्ड तेजसे सबको जला रहे थे और ब्रह्माकी निन्दा करते हुए रोते-से वे इधर-उधर दौड़ रहे थे। इस प्रकार रोने और दौड़नेके कारण वे 'रुद्र' कहे जाते हैं। निर्ऋति, शम्भु, तीसरे अपराजित, मृगव्याध, कपर्दी, दहन, ईश्वर, अहिर्बुध्न्य, भगवान् कपाली, पिंगल और महातेजस्वी सेनानी—ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं॥ २९-३९ १/२॥<br><br>तदनन्तर उसी श्रेष्ठ सुरभिसे यज्ञकी साधनभूता गौएँ, प्रकृष्ट माया, अविनाशी पशुगण, बकरियाँ, हंस, उत्तम अमृत और ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। धर्मके संयोगसे लक्ष्मीने कामको और साध्याने साध्यगणोंको जन्म दिया। भव, प्रभव, ईश, असुरहन्ता, अरुण, आरुणि, विश्वावसु, बल, ध्रुव, हविष्य, वितान, विधान, शमित, वत्सर, सम्पूर्ण असुरोंके विनाशक भूति और सुपर्वा—इन देवताओंको लोकनमस्कृता परम सुन्दरी साध्यादेवीने धर्मके संयोगसे जन्म दिया। इसी प्रकार प्रथम वर, दूसरे अविनाशी ध्रुव, तीसरे विश्वावसु, चौथे ऐश्वर्यशाली सोम, पाँचवें अनुरूपमाय, तदनन्तर छठे यम, सातवें वायु और आठवें वसु निर्ऋति—ये सभी धर्मके पुत्र सुदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। धर्मके संयोगसे विश्वाके गर्भसे विश्वेदेवोंकी उत्पत्ति हुई है—ऐसा सुना जाता है। महाबाहु दक्ष, पुष्करस्वन, चाक्षुष मनु, मधु, महोरग, विश्रान्तकवपु, बाल, महायशस्वी विष्कम्भ और सूर्यकी-सी कान्तिवाले अत्यन्त पराक्रमी एवं तेजस्वी गरुड—इन विश्वेदेवोंको देवमाता विश्वेशाने पुत्ररूपमें जन्म दिया॥ ४०—५० १/२॥ |