मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context७२२ | * मत्स्यपुराण *
| हिरण्यकशिपुर्दृष्ट्वा तदा तन्महदद्भुतम्।<br>उच्चैः प्रणतसर्वाङ्गो वाक्यमेतदुवाच ह॥ ६४<br><br>भगवन्नद्भुतमिदं संवृत्तं लोकसाक्षिकम्।<br>तपसा ते मुनिश्रेष्ठ परितुष्टः पितामहः॥ ६५<br><br>अहं तु तव पुत्रस्य तव चैव महाव्रत।<br>भृत्य इत्यवगन्तव्यः साध्यो यदिह कर्मणा॥ ६६<br><br>तन्मां पश्य समापन्नं तवैवाराधने रतम्।<br>यदि सीदेन्मुनिश्रेष्ठ तवैव स्यात्पराजयः॥ ६७<br><br>ऊर्व उवाच<br><br>धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य तेऽहं गुरुः स्थितः।<br>नास्ति मे तपसानेन भयमद्येह सुव्रत॥ ६८<br><br>तामेव मायां गृह्णीष्व मम पुत्रेण निर्मिताम्।<br>निरिन्धनामग्निमयीं दुर्धर्षां पावकैरपि॥ ६९<br><br>एषा ते स्वस्य वंशस्य वशगारिविनिग्रहे।<br>संरक्ष्यत्यात्मपक्षं च विपक्षं च प्रधर्षति॥ ७०<br><br>एवमस्त्विति तां गृह्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ।<br>जगाम त्रिदिवं हृष्टः कृतार्थो दानवेश्वरः॥ ७१<br><br>एषा दुर्विषहा माया देवैरपि दुरासदा।<br>और्वेण निर्मिता पूर्वे पावकेनोर्वसूनुना॥ ७२<br><br>तस्मिंस्तु व्युत्थिते दैत्ये निर्वीर्येषा न संशयः।<br>शापो ह्यस्याः पुरा दत्तः सृष्टा येनैव तेजसा॥ ७३<br><br>यद्येषा प्रतिहन्तव्या कर्तव्यो भगवान् सुखी।<br>दीयंतां मे सखा शक्र तोययोनिर्निशाकरः॥ ७४<br><br>तेनाहं सह संगम्य यादोभिश्च समावृतः।<br>मायामेतां हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्न संशयः॥ ७५ | तदनन्तर उस महान् अद्भुत प्रसङ्गको देखकर हिरण्यकशिपु ऊर्व मुनिको साष्टाङ्ग प्रणामकर उच्चस्वरसे इस प्रकार बोला—'भगवन्! यह तो अत्यन्त अद्भुत घटना घटित हुई। सारा जगत् इसका साक्षी है। मुनिश्रेष्ठ! आपकी तपस्यासे पितामह ब्रह्मा संतुष्ट हो गये हैं। महाव्रत! आप ऐसा समझिये कि मैं आपका तथा आपके पुत्रका भृत्य हूँ, अतः यहाँ जो कुछ कार्य हो, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये। मुझे अपना शरणागत समझिये। मैं आपकी ही आराधनामें निरत हूँ। मुनिश्रेष्ठ! इसपर भी यदि मैं कष्ट पाता हूँ तो यह आपकी ही पराजय होगी॥ ६४—६७॥<br><br>ऊर्वने कहा—सुव्रत! यदि मैं तुम्हारे गुरुके रूपमें स्थित हूँ तो मैं धन्य हो गया। तुमने मुझपर महान् अनुग्रह किया। अब तुम्हें मेरी इस तपस्याके बलसे जगत्में किसी प्रकारका भय नहीं है। इसके लिये तुम मेरे पुत्रद्वारा निर्मित उसी मायाको ग्रहण करो, जो इन्धनरहित होनेपर भी अग्निमयी और अग्नियोंद्वारा भी दुर्धर्ष है। शत्रुओंका निग्रह करते समय यह माया तुम्हारे निजी वंशके वशमें रहेगी। यह आत्मपक्षका संरक्षण और विपक्षका विनाश करेगी। यह सुनकर दानवेश्वर हिरण्यकशिपुने 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर उस मायाको ग्रहणकर मुनिश्रेष्ठ ऊर्वको प्रणाम किया और वह कृतार्थ होकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गको चला गया। (वरुण कहते हैं—) यह वही माया है, जो असह्य और देवताओंके लिये भी दुर्गम्य है। इसे पूर्वकालमें ऊर्वके पुत्र और्व अग्निने निर्मित किया था। उस हिरण्यकशिपु दैत्यके मर जानेपर निःसंदेह यह माया शक्तिहीन हो जायगी; क्योंकि यह जिसके तेजसे उत्पन्न हुई थी, उन ऊर्व ऋषिने इसे पहले ही ऐसा शाप दे रखा है। अतः शक्र! यदि आप इसका विनाश करके सबको सुखी करना चाहते हैं तो जलके उत्पत्तिस्थान चन्द्रमाको मुझे सखारूपमें प्रदान कीजिये। जल-जन्तुओंसे घिरा हुआ मैं उनके साथ रहकर आपकी कृपासे इस मायाको नष्ट कर डालूँगा—इसमें संशय नहीं है॥ ६८—७५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७५॥