मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
Page 733 of 1098
Read in contextPage 733
| * अध्याय १७६ * | ७२३ |
|---|
एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय
चन्द्रमाकी सहायतासे वरुणद्वारा और्वाग्नि-मायाका प्रशमन, मयद्वारा शैली-मायाका प्राकट्य, भगवान् विष्णुके आदेशसे अग्नि और वायुद्वारा उस मायाका निवारण तथा कालनेमिका रणभूमिमें आगमन
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**देवताओंकी वृद्धि करनेवाले इन्द्र परम प्रसन्न हुए और 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर सर्वप्रथम शीतायुध चन्द्रमाको युद्धके लिये आदेश देते हुए बोले—'सोम ! आप जाइये और असुरोंके विनाश तथा देवताओंकी विजयके निमित्त पाशधारी वरुणकी सहायता कीजिये। आप मुझसे भी बढ़कर पराक्रमी और ज्योतिर्गणोंके अधीश्वर हैं। रसज्ञ लोग सम्पूर्ण लोकोंमें जितने रस हैं, उन्हें आपसे ही युक्त मानते हैं। आपके मण्डलमें सागरकी तरह क्षय और वृद्धि स्पष्टरूपसे होती रहती है। आप जगत्में कालका योग करते हुए दिन-रातका परिवर्तन करते रहते हैं। आपका चिह्न लोककी छायासे युक्त है। आप मृगलाञ्छन हैं। सोम ! जो नक्षत्रोंके उत्पत्तिकर्ता हैं, वे देवता भी आपकी महिमाको नहीं जानते। आप सूर्यके मार्गसे ऊपर सभी ज्योतिर्गणोंके ऊपरी भागमें स्थित हैं और अपने तेजसे अन्धकारको दूर कर सम्पूर्ण जगत्को उद्भासित करते हैं। आप श्वेतभानु, हिमतनु, ज्योतियोंके अधीश्वर, शशलाञ्छन, कालयोंग-स्वरूप, अग्निहोत्र-वेदाध्ययन आदि कर्मरूप, यज्ञके परिणामभूत, अविनाशी, ओषधियोंके स्वामी, कर्मके उत्पादक, शिवजीके मस्तकपर स्थित, शीतल किरणोंवाले, अमृतके आश्रयस्थान, चञ्चल और श्वेतवाहन हैं। आप ही सौन्दर्यशाली व्यक्तियोंके सौन्दर्य हैं और आप ही सोमपान करनेवालोंके लिये सोम हैं। आपका स्वभाव समस्त प्राणियोंके लिये सौम्य है। आप अन्धकारके विनाशक और नक्षत्रोंके स्वामी हैं। इसलिये महासेन ! आप कवचधारी वरुणके साथ जाइये और उस आसुरी मायाको शान्त कीजिये, जिससे हमलोग युद्धस्थलमें जल रहे हैं'॥ १—१०॥ |
|---|---|
| एवमस्त्विति संहृष्टः शक्रस्त्रिदशवर्धनः।<br>संदिदेशाग्रतः सोमं युद्धाय शिशिरायुधम्॥ १<br>गच्छ सोम सहायत्वं कुरु पाशधरस्य वै।<br>असुराणां विनाशाय जयार्थं च दिवौकसाम्॥ २<br>त्वं मत्तः प्रतिवीर्यश्च ज्योतिषां चेश्वरेश्वरः।<br>त्वन्मयं सर्वलोकेषु रसं रसविदो विदुः॥ ३<br>क्षयवृद्धी तव व्यक्ते सागरस्येव मण्डले।<br>परिवर्तस्यहोरात्रं कालं जगति योजयन्॥ ४<br>लोकच्छायामयं लक्ष्म तवाङ्कः शशसंनिभः।<br>न विदुः सोम देवापि ये च नक्षत्रयोनयः॥ ५<br>त्वमादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपरि स्थितः।<br>तमः प्रोत्सार्य महसा भासयस्यखिलं जगत्॥ ६<br>श्वेतभानुर्हिमतनुर्ज्योतिषामधिपः शशी।<br>अधिकृत्कालयोगात्मा इष्टो यज्ञरसोऽव्ययः॥ ७<br>ओषधीशः क्रियायोनिर्हरशेखरभाक् तथा।<br>शीतांशुरामृताधारश्चपलः श्वेतवाहनः॥ ८<br>त्वं कान्तिः कान्तिवपुषां त्वं सोमः सोमपायिनाम्।<br>सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट्॥ ९<br>तद् गच्छ त्वं महासेन वरुणेन वरूथिना।<br>शमय त्वासुरीं मायां यया दह्याम संयुगे॥ १० | |
| सोम उवाच | **सोमने कहा—**वरदायक देवराज! यदि आप मुझे युद्धके लिये आदेश देते हैं तो मैं अभी दैत्योंकी मायाका विनाश करनेवाले शिशिरकी वर्षा करता हूँ। |
| यन्मां वदसि युद्धार्थे देवराज वरप्रद।<br>एष वर्षामि शिशिरं दैत्यमायापकर्षणम्॥ ११ |