मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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७६० * मत्स्यपुराण *
| जन्मान्तरशतैर्देवि योगोऽयं यदि लभ्यते।<br>मोक्षः शतसहस्रेण जन्मना लभ्यते न वा॥ ३८<br>अविमुक्ते न संदेहो मद्भक्तः कृतनिश्चयः।<br>एकेन जन्मना सोऽपि योगं मोक्षं च विन्दति॥ ३९<br>अविमुक्ते नरा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चिताः।<br>ते विशन्ति परं स्थानं मोक्षं परमदुर्लभम्॥ ४०<br>पृथिव्यामीदृशं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति।<br>चतुर्मूर्तिः सदा धर्मस्तस्मिन् संनिहितः प्रिये।<br>चतुर्णामपि वर्णानां गतिस्तु परमा स्मृता॥ ४१ | देवि! करोड़ों जन्मोंके पश्चात् मोक्षकी प्राप्ति होती है या नहीं, इसमें भी संदेह है, परंतु यदि कहीं सैकड़ों जन्मोंके बाद ऐसा योग उपलब्ध हो जाय तो दृढ़ निश्चयवाला मेरा भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें एक ही जन्ममें योग और मोक्षको प्राप्त कर लेता है। देवि! जो दृढ़ निश्चयसे सम्पन्न पुरुष अविमुक्तक्षेत्रमें जाते हैं वे परम दुर्लभ श्रेष्ठ मोक्षपदको प्राप्त करते हैं। प्रिये! पृथ्वीमें ऐसा क्षेत्र न हुआ है और न होगा। चार मूर्तिवालाधर्म इस क्षेत्रमें सदा निवास करता है। यहाँ चारों वर्णोंकी परम गति कही गयी है॥ ३५–४१॥ |
| देव्युवाच<br>श्रुता गुणास्ते क्षेत्रस्य इह चान्यत्र ये प्रभो।<br>वदस्व भुवि विप्रेन्द्राः कं वा यज्ञैर्यजन्ति ते॥ ४२ | देवीने पूछा—प्रभो! आपके क्षेत्रके लौकिक और पारलौकिक गुणोंको मैंने सुन लिया। अब यह बतलाइये कि पृथ्वीपर जो श्रेष्ठ विप्रवृन्द हैं वे यज्ञोंद्वारा किसका यजन करते हैं?॥ ४२॥ |
| ईश्वर उवाच<br>इज्यया चैव मन्त्रेण मामेव हि यजन्ति ये।<br>न तेषां भयमस्तीति भवं रुद्रं यजन्ति यत्॥ ४३<br>अमन्त्रो मन्त्रको देवि द्विविधो विधिरुच्यते।<br>सांख्यं चैवाथ योगश्च द्विविधो योग उच्यते॥ ४४<br>सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।<br>सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ ४५<br>आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।<br>तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ ४६<br>निर्गुणः सगुणो वापि योगश्च कथितो भुवि।<br>सगुणश्चैव विज्ञेयो निर्गुणो मनसः परः॥ ४७<br>एतत् ते कथितं देवि यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ४८ | ईश्वरने कहा—जो यज्ञ और मन्त्रद्वारा मेरा ही यजन करते हैं उन लोगोंको कोई भय नहीं रह जाता; क्योंकि वे भव और रुद्रकी आराधना करनेवाले हैं। देवि! मन्त्ररहित और मन्त्रसहित—दोनों प्रकारकी विधियाँ कही गयी हैं। इसी प्रकार सांख्य और योगके भेदसे योग भी दो प्रकारका कहा गया है। जो सजातीय, विजातीय एवं स्वगत भेदोंसे शून्य हो सबको एक मानकर सभी प्राणियोंमें स्थित मेरी आराधना करता है वह योगी सदा अपने स्वरूपमें रहता हुआ भी मुझमें ही स्थित रहता है। जो सर्वत्र सबको आत्मसदृश मुझमें अवस्थित देखता है, उससे न तो मैं वियुक्त होता हूँ और न वह मुझसे अलग होता है। भूतलपर निर्गुण और सगुण—दो प्रकारके योग कहे गये हैं। उनमें सगुण योग ही ज्ञानके द्वारा जाना जा सकता है, निर्गुण योग मनसे परे है। देवि! जो तुमने मुझसे पूछा है, वह मैंने तुम्हें बतला दिया॥ ४३–४८॥ |
| देव्युवाच<br>या भक्तिस्त्रिविधा प्रोक्ता भक्तानां बहुधा त्वया।<br>तामहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः कथयस्व मे॥ ४९ | देवीने पूछा—आपने भक्तोंकी जो तीन प्रकारकी भक्ति अनेक बार कही है उसे मैं सुनना चाहती हूँ। आप उसका यथार्थरूपमें मुझसे वर्णन कीजिये॥ ४९॥ |
| ईश्वर उवाच<br>शृणु पार्वति देवेशि भक्तानां भक्तवत्सले।<br>प्राप्य सांख्यं च योगं च दुःखान्तं च नियच्छति॥ ५० | ईश्वर (शिव)-ने कहा—भक्तोंके प्रति वात्सल्य भाव रखनेवाली देवेश्वरी पार्वती! सुनो। जो सांख्य और योगको प्राप्तकर दुःखका सर्वथा विनाश कर लेता है, |