मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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| * अध्याय १८३ * | ७६१ |
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| सदा यः सेवते भिक्षां ततो भवति रञ्जितः।<br>रञ्जनात् तन्मयो भूत्वा लीयते स तु भक्तिमान्॥ ५१<br>शास्त्राणां तु वरारोहे बहुकारणदर्शिनः।<br>न मां पश्यन्ति ते देवि ज्ञानवाक्यविवादिनः॥ ५२<br>परमार्थज्ञानतृप्ता युक्ता जानन्ति योगिनः।<br>विद्यया विदितात्मानो योगस्य च द्विजातयः॥ ५३<br>प्रत्याहारेण शुद्धात्मा नान्यथा चिन्तयेच्च तत्।<br>तुष्टिं च परमां प्राप्य योगं मोक्षं परं तथा।<br>त्रिभिर्गुणैः समायुक्तो ज्ञानवान् पश्यतीह माम्॥ ५४<br>एतत् ते कथितं देवि किमन्यच्छ्रोतुर्महसि।<br>भूय एव वरारोहे कथयिष्यामि सुव्रते॥ ५५<br>गुह्यं पवित्रमथवा यच्चापि हृदि वर्त्तते।<br>तत् सर्वं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः प्रिये॥ ५६ | सदा भिक्षासे जीवन-यापन करता है और उसीसे प्रसन्न रहता है तथा इस प्रकार प्रसन्नताके कारण उसीमें तन्मय होकर लीन हो जाता है, वह भक्तिमान् कहलाता है। वरारोहे! जो शास्त्रोंके अनेकों कारणोंपर विचार करनेवाले हैं, वे ज्ञानवाक्योंमें विवाद करनेवाले लोग मेरा दर्शन नहीं कर पाते। देवि! जो परमार्थ-ज्ञानसम्पन्न योगी हैं तथा जो द्विजातिवृन्द योगके ज्ञानसे आत्मज्ञानको प्राप्त कर चुके हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं। जिसका आत्मा प्रत्याहारके द्वारा विशुद्ध हो गया है, जो परम संतोष, उत्कृष्ट योग और मोक्षको पाकर अन्यथा विचार नहीं करते और तीनों गुणोंसे सम्पन्न हैं, ऐसे ज्ञानी इस अविमुक्तक्षेत्रमें मेरा साक्षात्कार कर पाते हैं। देवि! यह तो मैंने तुमसे कह दिया, अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? उत्तम पातिव्रत धारण करनेवाली सुन्दरि! मैं पुनः उसका वर्णन करूँगा। प्रिये! जो गोपनीय, पावन अथवा हृदयमें वर्तमान है, वह सब मैं कहूँगा, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ ५०-५६॥ |
| देव्युवाच<br>त्वद्रूपं कीदृशं देव युक्ताः पश्यन्ति योगिनः।<br>एतं मे संशयं ब्रूहि नमस्ते सुरसत्तम॥ ५७ | देवीने पूछा— देव! योगसिद्धिसम्पन्न योगिगण आपके कैसे स्वरूपका दर्शन करते हैं? देवश्रेष्ठ! मैं आपको नमस्कार करती हूँ, आप मेरे इस संदेहपर प्रकाश डालिये॥ ५७॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>अमूर्तं चैव मूर्तं च ज्योतीरूपं हि तत् स्मृतम्।<br>तस्योपलब्धिमन्विच्छन् यत्नः कार्यो विजानता॥ ५८<br>गुणैर्वियुक्तो भूतात्मा एवं वक्तुं न शक्यते।<br>शक्यते यदि वक्तुं वै दिव्यैर्वर्षशतैर्न वा॥ ५९ | श्रीभगवान्ने कहा— मेरा वह ज्योतिःस्वरूप अमूर्त और मूर्त—दो प्रकारका कहा गया है। विद्वान् पुरुषको उसे प्राप्त करनेकी अभिलाषासे प्रयत्न करना चाहिये। जो प्राणी गुणोंसे रहित है, वह इस प्रकार इसका वर्णन नहीं कर सकता। यदि करना चाहे तो सैकड़ों दिव्य वर्षोंमें कर सकता है या नहीं—इसमें भी संदेह है॥ ५८-५९॥ |
| देव्युवाच<br>किं प्रमाणं तु तत्क्षेत्रं समन्तात् सर्वतो दिशम्।<br>यत्र नित्यं स्थितो देवो महादेवो गणैर्युतः॥ ६० | देवीने पूछा— जहाँ देवाधिदेव महादेव अपने गणोंके साथ नित्य स्थित रहते हैं, वह क्षेत्र चारों ओर सभी दिशाओंमें कितनी दूरतक विस्तृत है?॥ ६०॥ |
| ईश्वर उवाच<br>द्वियोजनं तु तत् क्षेत्रं पूर्वपश्चिमतः स्मृतम्।<br>अर्धयोजनविस्तीर्णं तत् क्षेत्रं दक्षिणोत्तरम्॥ ६१<br>वरणाऽसी नदी यावत् तावच्छुक्लनदी तु वै।<br>भीष्मचण्डिकमारभ्य पर्वतेश्वरमन्तिके॥ ६२ | भगवान् शङ्करने कहा— वह क्षेत्र पूर्वसे पश्चिमतक दो योजन और दक्षिणसे उत्तरतक आधा योजन विस्तृत बतलाया जाता है। जहाँतक वरुणा और असी नदियाँ हैं, वहाँतक भीष्मचण्डिकसे लेकर पर्वतेश्वरके समीपतक शुक्लनदी है। |