मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
Page 772 of 1098
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| ७६२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गणा यत्रावतिष्ठन्ति सन्नियुक्ता विनायकाः।<br>कूष्माण्डगजतुण्डश्च जयन्तश्च मदोत्कटाः॥ ६३<br>सिंहव्याघ्रमुखाः केचिद् विकटाः कुब्जवामनाः।<br>यत्र नन्दी महाकालश्चण्डघण्टो महेश्वरः॥ ६४<br>दण्डचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महाबलः।<br>एते चान्ये च बहवो गणाश्चैव गणेश्वराः॥ ६५<br>महोदरा महाकाया वज्रशक्तिधरास्तथा।<br>रक्षन्ति सततं देवि ह्यविमुक्तं तपोवनम्।<br>द्वारे द्वारे च तिष्ठन्ति शूलमुद्गरपाणयः॥ ६६ | जहाँ कूष्माण्ड, गजतुण्ड, जयन्त, उत्कट पराक्रमी विनायकगण भलीभाँति नियुक्त होकर विराजमान रहते हैं। उनमें कुछ सिंह एवं बाघके-से मुखवाले, कुछ भयंकर, कुबड़े और वामन (बोने) हैं। जहाँ नन्दी, महाकाल, चण्डघण्ट, महेश्वर, दण्डचण्डेश्वर, महाबली घण्टाकर्ण—ये एवं अन्य अनेक गणसमूह और गणेश्वरवृन्द विद्यमान रहते हैं। देवि! ये सभी विशाल उदरवाले एवं विशालकाय हैं तथा हाथमें वज्र और शक्ति धारण करके इस अविमुक्त तपोवनकी सदा रक्षा करते हैं। ये सभी हाथमें शूल और मुद्गर धारण कर प्रत्येक द्वारपर स्थित रहते हैं॥ ६१—६६॥ |
| सुवर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां चैलाजिनपयस्विनीम्।<br>वारणस्यां तु यो दद्यात् सवत्सां कांस्यभाजनाम्॥ ६७<br>गां दत्त्वा तु वरारोहे ब्राह्मणे वेदपारगे।<br>आसप्तमं कुलं तेन तारितं नात्र संशयः॥ ६८<br>यो दद्याद् ब्राह्मणे किञ्चित् तस्मिन् क्षेत्रे वरानने।<br>कनकं रजतं वस्त्रमन्नाद्यं बहुविस्तरम्॥ ६९<br>अक्षयं चाव्ययं चैव स्यातां तस्य सुलोचने।<br>शृणु तत्त्वेन तीर्थस्य विभूतिं व्युष्टिमेव च॥ ७०<br>तत्र स्नात्वा महाभागे भवन्ति नीरुजा नराः।<br>दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति मानवः॥ ७१<br>तदवाप्नोति धर्मात्मा तत्र स्नात्वा वरानने।<br>बहुस्वल्पे च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे॥ ७२<br>शुभां गतिमवाप्नोति अग्निवच्चैव दीप्यते।<br>वाराणसीजाह्नवीभ्यां संगमे लोकविश्रुते॥ ७३<br>दत्त्वान्नं च विधानेन न स भूयोऽभिजायते।<br>एतत् ते कथितं देवि तीर्थस्य फलमुत्तमम्॥ ७४ | वरारोहे! जो स्वर्णजटित सींगोंवाली, चाँदीसे युक्त खुरोंवाली, सुन्दर वस्त्र और मृगचर्मसे सुशोभित, दूध देनेवाली, कांस्यदोहनीसे युक्त सवत्सा गौका वाराणसीमें वेदपारङ्गत ब्राह्मणको दान करता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंको तार देता है—इसमें संदेह नहीं है। वरानने! जो उस क्षेत्रमें थोड़ा अथवा अधिक मात्रामें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, अन्न आदि ब्राह्मणको दान करता है, सुलोचने! उसका वह दान अक्षय एवं अविनाशी हो जाता है। महाभागे! इस तीर्थकी वास्तविक विभूति और विशिष्ट फलको सुनो। वहाँ स्नान कर मनुष्य रोगरहित हो जाते हैं। वरानने! दस अश्वमेध याग करनेसे मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह उस धर्मात्मा व्यक्तिको वहाँ स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो वेदके पारङ्गत ब्राह्मणको अधिक या स्वल्प—जो भी अपनी शक्तिके अनुसार दान देता है, उस दानसे उसे शुभ गति प्राप्त होती है और वह अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। जो संसारमें प्रसिद्ध वरुणा-असी और गङ्गाके संगमपर विधानपूर्वक अन्नका दान देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। देवि! मैंने इस तीर्थका यह उत्तम फल तुम्हें बतला दिया॥६७—७४॥ |
| पुनरन्यत् प्रवक्ष्यामि तीर्थस्य फलमुत्तमम्।<br>उपवासं तु यः कृत्वा विप्रान् संतर्पयेन्नरः।<br>सौत्रामणेश्च यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ७५<br>एकाहारस्तु यस्तिष्ठेन्मासं तत्र वरानने।<br>यावज्जीवकृतं पापं सहसा तस्य नश्यति॥ ७६ | अब मैं पुनः इस तीर्थका अन्य उत्तम फल बतला रहा हूँ। जो मनुष्य इस तीर्थमें उपवासपूर्वक विप्रोंको भलीभाँति तृप्त करता है, वह मानव सौत्रामणि नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है। वरानने! जो वहाँ एक मासतक एक समय भोजन कर जीवन व्यतीत करता है, उसका जीवनपर्यन्त किया हुआ पाप अनायास ही नष्ट हो |