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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 816 of 1098

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Page 816
८०६* मत्स्यपुराण *

एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय

नर्मदा-माहात्म्य-प्रसङ्गमें कपिलादि विविध तीर्थोंका माहात्म्य, भृगुतीर्थका माहात्म्य, भृगुमुनिकी तपस्या, शिव-पार्वतीका उनके समक्ष प्रकट होना, भृगुद्वारा उनकी स्तुति और शिवजीद्वारा भृगुको वर-प्रदान

मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा—
ततस्त्वनरकं गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र नरकं च न पश्यति॥ १<br>तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन।<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र यस्यास्थीनि विनिक्षिपेत्॥ २<br>विलयं यान्ति पापानि रूपवाञ्जायते नरः।<br>गोतीर्थं तु ततो गत्वा सर्वपापात् प्रमुच्यते॥ ३<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र गत्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ४<br>ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः।<br>तत्रोपोष्या नरो भक्त्या कपिलां यः प्रयच्छति॥ ५<br>घृतेन दीपं प्रज्वाल्य घृतेन स्नापयेच्छिवम्।<br>सघृतं श्रीफलं जग्ध्वा दत्त्वा चान्ते प्रदक्षिणम्॥ ६<br>घण्टाभरणसंयुक्तां कपिलां यः प्रयच्छति।<br>शिवतुल्यबलो भूत्वा नैवासौ जायते पुनः॥ ७<br>अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां तु विशेषतः।<br>पूजयेत् तु शिवं भक्त्या ब्राह्मणेभ्यश्च भोजनम्॥ ८<br>अङ्गारकनवम्यां तु अमायां च विशेषतः।<br>स्नापयेत् तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ ९<br>घृतेन स्नापयेल्लिङ्गं पूजयेद् भक्तितो द्विजान्।<br>पुष्पकेण विमानेन सहस्रैः परिवारितः॥ १०<br>शैवं पदमवाप्नोति यत्र चाभिमतं भवेत्।<br>अक्षयं मोदते कालं यथा रुद्रस्तथैव सः॥ ११<br>यदा तु कर्मसंयोगान्मर्त्यलोकमुपागतः।<br>राजा भवति धर्मिष्ठो रूपवाञ्जायते कुले॥ १२<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऋषितीर्थमनुत्तमम्।<br>तृणबिन्दुर्नार्म ऋषिः शापदग्धो व्यवस्थितः॥ १३<br>तत्तीर्थस्य प्रभावेण शापमुक्तोऽभवद् द्विजः।राजन्! तदनन्तर अनरक नामक तीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मानवको नरकका दर्शन नहीं होता। पाण्डुनन्दन! अब आप उस तीर्थका माहात्म्य सुनिये। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जिसकी हड्डियाँ डाल दी जाती हैं, उसके पापसमूह नष्ट हो जाते हैं और वह पुनः रूपवान् होकर जन्म ग्रहण करता है। तत्पश्चात् गोतीर्थमें जाकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ कपिलातीर्थकी यात्रा करे। राजन्! जो मनुष्य ज्येष्ठ-मासमें विशेषकर चतुर्दशी तिथिको वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान और उपवासकर कपिला गौका दान करता है, उसे एक हजार गोदानका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ घीसे दीपक जलाकर घीसे शिवको स्नान कराता है और घृतके साथ बेलको स्वयं खाता है एवं दान देता है तथा अन्तमें प्रदक्षिणा करके घण्टा और अलंकारसे विभूषित कपिला गौका दान करता है, वह शिवके तुल्य बलवान् होता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। मंगलवारको विशेषकर चतुर्थी तिथिको शिवकी भक्तिपूर्वक पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। मंगलवारकी नवमी एवं विशेषतया अमावस्या तिथिको यत्नपूर्वक शिवको स्नान करानेसे मनुष्य रूपवान् और भाग्यवान् होता है। जो घृतसे शिवलिङ्गको स्नान कराकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, वह हजारों विमानोंसे घिरे हुए पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो शिवलोकको जाता है और यहाँ अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करता है तथा रुद्रके समान ही अक्षय कालतक वहाँ आनन्दका उपभोग करता है। जब कभी कर्मवश वह मृत्युलोकमें आता है तो कुलीन वंशमें जन्म ग्रहण करता है और रूपवान् धर्मात्मा राजा होता है। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ऋषितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। यहाँ तृणबिन्दु नामक ऋषि शापसे दग्ध होकर स्थित थे, किंतु इस तीर्थके प्रभावसे वे द्विज शापसे मुक्त हो गये॥ १—१३॥