मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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| * अध्याय १९३ * | ८०७ |
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| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र गङ्गेश्वरमनुत्तमम् ॥ १४<br>श्रावणे मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे चतुर्दशी ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते ॥ १५<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा मुच्यते च ऋणत्रयात् ।<br>गङ्गेश्वरसमीपे तु गङ्गावदनमुत्तमम् ॥ १६<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नात्वा तु मानवः ।<br>आजन्मजनितैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ १७<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा व्रजेद् वै यत्र शंकरः ।<br>सर्वदा पर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ १८<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा ह्यश्वमेधफलं लभेत् ।<br>प्रयागे यत्फलं दृष्टं शंकरेण महात्मना ॥ १९<br>तदेव निखिलं दृष्टं गङ्गावदनसंगमे ।<br>तस्यैव पश्चिमे स्थाने समीपे नातिदूरतः ॥ २०<br>दशाश्वमेधजननं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।<br>उपोष्य रजनीमेकां मासि भाद्रपदे तथा ॥ २१<br>अमायां च नरः स्नात्वा व्रजते यत्र शंकरः ।<br>सर्वदा पर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ २२<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा चाश्वमेधफलं लभेत् ।<br>दशाश्वमेधात् पश्चिमतॊ भृगुर्ब्राह्मणसत्तमः ॥ २३<br>दिव्यं वर्षं सहस्रं तु ईश्वरं पर्युपासत ।<br>वल्मीकवेष्टितश्चासौ पक्षिणां च निकेतनः ॥ २४<br>आश्चर्यं सुमहज्जातमुमायाः शंकरस्य च ।<br>गौरी पप्रच्छ देवेशं कोऽयमेवं तु संस्थितः ।<br>देवो वा दानवो वाथ कथयस्व महेश्वर ॥ २५ | राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ गङ्गेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ श्रवणमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको स्नानमात्र कर लेनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है तथा पितरोंका तर्पण कर देव, पितर और ऋषि—इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। गङ्गेश्वरतीर्थके समीपमें गङ्गावदन नामक श्रेष्ठ तीर्थ है। वहाँ कामनापूर्वक या निष्काम होकर स्नान कर मनुष्य अपने जन्मभरके किये हुए पापोंसे छुटकारा पा जाता है, इसमें संदेह नहीं है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्यको जहाँ शंकर हैं, वहीं जाना चाहिये और वहाँ सर्वदा पर्वदिनपर स्नान करना चाहिये। वहाँ पितरोंका तर्पण करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। प्रयागमें स्नान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह सम्पूर्ण फल गङ्गावदनसङ्गममें महात्मा शंकरके दर्शनसे प्राप्त हो जाता है। उसीके पश्चिम दिशामें संनिकट ही दशाश्वमेधजनन नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। भाद्रपदमासकी अमावास्या तिथिको वहाँ एक रात उपवासकर स्नान करनेके पश्चात् शंकरके निकट जाना चाहिये और वहाँ सर्वदा पर्वके अवसरपर स्नान करना चाहिये। वहाँ पितरोंका तर्पण करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। दशाश्वमेधसे पश्चिम दिशामें ब्राह्मणश्रेष्ठ भृगुने एक हजार दिव्य वर्षोंतक शिवजीकी उपासना की थी। उनका शरीर बिमवटसे परिवेष्टित हो गया था, जिससे वे पक्षियोंके निवासस्थान बन गये थे। यह देखकर उमा और शंकरको महान् आश्चर्य उत्पन्न हुआ। तब पार्वतीके शंकरजीसे पूछा—'महेश्वर! यह कौन इस प्रकार समाधिस्थ है? यह देव है अथवा दानव? यह मुझे बतलाइये॥ १४—२५॥ |
| महेश्वर उवाच<br>भृगुर्नाम द्विजश्रेष्ठ ऋषीणां प्रवरो मुनिः ।<br>मां ध्यायते समाधिस्थो वरं प्रार्थयते प्रिये ॥ २६<br><br>ततः प्रहसिता देवी ईश्वरं प्रत्यभाषत ।<br><br>धूमवत्तच्छिखा जाता ततोऽद्यापि न तुष्यसे ।<br>दुराराध्योऽसि तेन त्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ २७ | **महेश्वर बोले—**प्रिये! ये द्विजश्रेष्ठ भृगु हैं, जो ऋषियोंमें श्रेष्ठ मुनि हैं। ये समाधिस्थ होकर मेरा ध्यान कर रहे हैं और वर प्राप्त करना चाहते हैं। यह सुनकर पार्वतीदेवी हँस पड़ीं और महेश्वरसे बोलीं—'भगवन्! इस तपस्वीकी शिखा धुएँके समान हो गयी, फिर भी आप अभी भी संतुष्ट नहीं हो रहे हैं। इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप महान् कष्टसे आराधित-प्रसन्न होते हैं, इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है॥२६-२७॥ |
| महेश्वर उवाच<br>न जानासि महादेवि ह्ययं क्रोधेन वेष्टितः ।<br>दर्शयामि यथातथ्यं प्रत्ययं ते करोम्यहम् ॥ २८ | **महेश्वरने कहा—**महादेवि! तुम नहीं जानती हो, ये मुनि क्रोधसे परिपूर्ण हैं। मैं तुम्हें अभी सत्य स्थिति |