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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 867 of 1098

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Page 867
* अध्याय २१५ *८५७
व्रतं समापयामास तस्यामेव तदा निशि।<br>ततस्तूर्यैस्त्रियामान्ते ससैन्यस्तस्य भूपतेः॥ १५<br>आजगाम जनः सर्वो राज्यार्थाय निमन्त्रणे।<br>विज्ञापयामास तदा तत्र प्रकृतिशासनम्॥ १६<br>विचक्षुषस्ते नृपते येन राज्यं पुरा हृतम्।<br>अमात्यैः स हतो राजा भवांस्तस्मिन् पुरे नृपः॥ १७<br>एतच्छ्रुत्वा ययौ राजा बलेन चतुरङ्गिणा।<br>लेभे च सकलं राज्यं धर्मराजान्महात्मनः॥ १८<br>भ्रातृणां तु शतं लेभे सावित्र्यपि वराङ्गना।<br>एवं पतिव्रता साध्वी पितृपक्षं नृपात्मजा॥ १९<br>उज्जहार वरारोहा भर्तृपक्षं तथैव च।<br>मोक्षयामास भर्तारं मृत्युपाशवशं गतम्॥ २०<br>तस्मात् साध्व्यः स्त्रियः पूज्याः सततं देववन्नरैः।<br>तासां राजन् प्रसादेन धार्यते वै जगत्त्रयम्॥ २१<br>तासां तु वाक्यं भवतीह मिथ्या<br>  न जातु लोकेषु चराचरेषु।<br>तस्मात् सदा ताः परिपूजनीयाः<br>  कामान् समग्रानभिकामयानैः॥ २२<br>यश्चेदं शृणुयान्नित्यं सावित्र्याख्यानमुत्तमम्।<br>स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः॥ २३उसका वर्णन किया और उसी रातमें अपने व्रतको भी समाप्त किया। तदनन्तर तीन पहर बीत चुकनेपर राजाकी सारी प्रजा सेनासहित तुरही आदि बाजोंको बजाते हुए राजाको पुनः राज्य करनेके लिये निमन्त्रण देने आयी और यह सूचना दी कि राज्यमें आपका शासन अब पूर्ववत् हो। राजन्! नेत्रहीन होनेके कारण जिस राजाने आपके राज्यको छीन लिया था, वह राजा मन्त्रियोंद्वारा मार डाला गया। अब उस नगरमें आप ही राजा हैं। यह सुनकर राजा चतुरंगिणी सेनाके साथ वहाँ गये और महात्मा धर्मराजकी कृपासे पुनः अपने सम्पूर्ण राज्यको प्राप्त किये। सुन्दरी सावित्रीने भी सौ भाइयोंको प्राप्त किया। इस प्रकार साध्वी पतिव्रता सुन्दरी राजकुमारी सावित्रीने अपने पितृपक्ष तथा पतिपक्ष—दोनोंका उद्धार किया और मृत्युके पाशमें बँधे हुए अपने पतिको मुक्त किया॥ ७—२०॥<br><br>राजन्! इसलिये मनुष्योंको सदा साध्वी स्त्रियोंकी देवताओंके समान पूजा करनी चाहिये; क्योंकि उनकी कृपासे ये तीनों लोक स्थित हैं। उन पतिव्रता स्त्रियोंके वाक्य इस चराचर जगत्‌में कभी भी मिथ्या नहीं होते, इसलिये सभी मनोरथोंकी कामना करनेवालोंको सर्वदा इनकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य सावित्रीके इस सर्वोत्तम आख्यानको नित्य सुनता है, वह सभी प्रयोजनोंमें सफलता प्राप्तकर सुखका अनुभव करता है और कभी भी दुःखका भागी नहीं होता॥ २१—२३॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्यानसमाप्तिर्नाम चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सावित्री-उपाख्यान-समाप्ति नामक दो सौ चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१४॥


दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय *

राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण

मनुरुवाच<br>राज्ञोऽभिषिक्तमात्रस्य किं नु कृत्यतमं भवेत्।<br>एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सम्यग्वेत्ति यतो भवान्॥ १<br>मत्स्य उवाच<br>अभिषेकार्द्रशिरसा राज्ञा राज्यावलोकिना।<br>सहायवरणं कार्यं तत्र राज्यं प्रतिष्ठितम्॥ २मनुने पूछा— भगवन्! अभिषेक होनेके बाद राजाको तुरंत कौन-सा कर्म करना आवश्यक है? वह सब मुझे बताइये; क्योंकि आप इसे अच्छी तरह जानते हैं॥ १॥<br>मत्स्यभगवान्‌ने कहा— राजन्! राज्यकी रक्षा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह अभिषेकके जलसे सिरके भीगते ही सहायकों (मन्त्रियों)-की नियुक्ति करे; क्योंकि राज्य उन्हींपर प्रतिष्ठित रहता है।

* चण्डेश्वरादिके 'राजनीतिरत्नाकर' आदि संग्रह बड़े श्रेष्ठ हैं। वे रामायण, महाभारत तथा पुराणादिसे ही संगृहीत हैं। उनमें भी मत्स्यपुराणोक्त इस राजनीतिप्रकरणका स्थान श्रेष्ठतर है, अतः यह अंश आजके राजनेताओंके लिये विशेष मननीय है।