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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

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Page 868

८५८ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम्।<br>पुरुषेणासहायेन किमु राज्यं महोदयम्॥ ३<br>तस्मात् सहायान् वरयेत् कुलीनान् नृपतिः स्वयं।<br>शूरान् कुलीनजातीयान् बलयुक्ताञ्छ्रियान्वितान्॥ ४<br>रूपसत्त्वगुणोपेतान् सजनान् क्षमयान्वितान्।<br>क्लेशक्षमान् महोत्साहान् धर्मज्ञांश्च प्रियंवदान्॥ ५<br>हितोपदेशकालज्ञान् स्वामिभक्तान् यशोऽर्थिनः।<br>एवंविधान् सहायांश्च शुभकर्मसु योजयेत्॥ ६<br>गुणहीनानपि तथा विज्ञाय नृपतिः स्वयं।<br>कर्मस्वेव नियुञ्जीत यथायोग्येषु भागशः॥ ७<br>कुलीनः शीलसम्पन्नो धनुर्वेदविशारदः।<br>हस्तिशिक्षाश्वशिक्षासु कुशलः श्लक्ष्णभाषितः॥ ८<br>निमित्ते शकुनज्ञाने वेत्ता चैव चिकित्सिते।<br>कृतज्ञः कर्मणां शूरस्तथा क्लेशसहस्त्वृजुः॥ ९<br>व्यूहतत्त्वविधानज्ञः फल्गुसारविशेषवित्।<br>राज्ञा सेनापतिः कार्यो ब्राह्मणः क्षत्रियोऽथवा॥ १०जो छोटे-से-छोटा भी कार्य होता है, वह भी सहायकरहित अकेले व्यक्तिके लिये दुष्कर होता है, फिर राज्य-जैसे महान् उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यके लिये तो कहना ही क्या है? इसलिये राजाको चाहिये कि जो उत्तम कुलमें उत्पन्न, शूर, उच्च जातिमें उत्पन्न, बलवान्, श्रीसम्पन्न, रूपवान्, सत्त्वगुणसे युक्त, सज्जन, क्षमाशील, कष्टसहिष्णु, महोत्साही, धर्मज्ञ, प्रियभाषी, हितोपदेशके कालका ज्ञाता, स्वामिभक्त तथा यशके अभिलाषी हों, ऐसे सहायकोंका स्वयं वरण करके उन्हें माङ्गलिक कर्मोंमें नियुक्त करे। उसी प्रकार स्वयं राजाको कुछ गुणहीन सहायकोंको भी जान-बूझकर उन्हें यथायोग्य कार्योंमें विभागपूर्वक नियुक्त करना चाहिये। राजाको उत्तम कुलोत्पन्न, शीलवान्, धनुर्वेदमें प्रवीण, हाथी और अश्वकी शिक्षामें कुशल, मृदुभाषी, शकुन और अन्यान्य शुभाशुभ कारणों तथा ओषधियोंको जाननेवाला, कृतज्ञ, शूरतामें प्रवीण, कष्टसहिष्णु, सरल, व्यूह-रचनाके विधानको जाननेवाला, निस्तत्त्व एवं सारतत्त्वका विशेषज्ञ, ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय पुरुषको सेनापति-पदपर नियुक्त करना चाहिये॥ २-१०॥
प्रांशुः सुरूपो दक्षश्च प्रियवादी न चोद्धतः।<br>चित्तग्राहश्च सर्वेषां प्रतीहारो विधीयते॥ ११ऊँचे कदवाला, सौन्दर्यशाली, कार्यकुशल, प्रियवक्ता, गम्भीर तथा सबके चित्तको आकर्षित करनेवालेको प्रतिहारी बनानेका विधान है।
यथोक्तवादी दूतः स्याद् देशभाषाविशारदः।<br>शक्तः क्लेशसहो वाग्मी देशकालविभागवित्॥ १२<br>विज्ञातदेशकालश्च दूतः स स्यान्महीक्षितः।<br>वक्ता नयस्य यः काले स दूतो नृपतेर्भवेत्॥ १३जो सत्यवादी, देशी भाषामें प्रवीण, सामर्थ्यशाली, सहिष्णु, वक्ता, देश-कालके विभागको जाननेवाला, देश-कालका जानकार तथा मौकेपर नीतिकी बातें कहनेवाला हो, वह राजाका दूत हो सकता है।
प्रांशवो व्यायताः शूरा दृढभक्ता निराकुलाः।<br>राज्ञा तु रक्षिणः कार्याः सदा क्लेशसहा हिताः॥ १४जो लम्बे कदवाले, कम सोनेवाले, शूर, दृढ़ भक्ति रखनेवाले, धैर्यवान्, कष्टसहिष्णु और हितैषी हों, ऐसे पुरुषोंको राजाद्वारा अङ्गरक्षकके कार्यमें नियुक्त किया जाना चाहिये।
अनाहार्योऽनृशंसश्च दृढभक्तिश्च पार्थिवे।<br>ताम्बूलधारी भवति नारी वाप्यथ तद्गुणा॥ १५जो दूसरोंद्वारा बहकाया न जा सके, दुष्ट स्वभावका न हो, राजामें अगाध भक्ति रखता हो—ऐसा पुरुष ताम्बूलधारी हो सकता है, अथवा ऐसे गुणवाली स्त्री भी नियुक्त की जा सकती है।
षाड्गुण्यविधितत्त्वज्ञो देशभाषाविशारदः।<br>सांधिविग्रहिकः कार्यो राज्ञा नयविशारदः॥ १६राजाको नीति शास्त्रके छः गुणोंके तत्त्वोंको जाननेवाले, देशी भाषामें प्रवीण एवं नीतिनिपुणको सन्धि-विग्राहिक बनाना चाहिये।
कृताकृतज्ञो भृत्यानां ज्ञेयः स्याद् देशरक्षिता।<br>आयव्ययज्ञो लोकज्ञो देशोत्पत्तिविशारदः॥ १७भृत्योंके कृत-अकृत कार्योंको जाननेवाले, आय-व्ययके ज्ञाता, लोकका जानकार और देशोत्पत्तिमें निपुण पुरुषको देशरक्षक बनाना चाहिये।