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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 873 of 1098

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Page 873
* अध्याय २१५ *८६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राज्ञा सहायाः कर्तव्याः पृथिवीं जेतुमिच्छता।<br>यथार्हं चाप्यसुभृतो राजा कर्मसु योजयेत् ॥ ७६<br>धर्मिष्ठान् धर्मकार्येषु शूरान् संग्रामकर्मसु ।<br>निपुणानर्थकृत्येषु सर्वत्रैव तथा शुचीन् ॥ ७७<br>स्त्रीषु षण्डं नियुञ्जीत तीक्ष्णं दारुणकर्मसु ।<br>धर्मे चार्थे च कामे च नये च रविनन्दन ॥ ७८<br>राजा यथार्हं कुर्याच्च उपधाभिः परीक्षणम् ।<br>समतीतोपदान् भृत्यान् कुर्याच्छस्तवनेचरान् ॥ ७९<br>तत्पादान्वेषिणो यत्तांस्तदध्यक्षकांस्तु कारयेत्।<br>एवमादीनि कर्माणि नृपैः कार्याणि पार्थिव ॥ ८०<br>सर्वथा नेष्यते राजंस्तीक्ष्णोपकरणक्रमः।<br>कर्माणि पापसाध्यानि यानि राज्ञो नराधिप ॥ ८१<br>संतस्तानि न कुर्वन्ति तस्मात्तानि त्यजेन्नृपः।<br>नेष्यते पृथिवीशानां तीक्ष्णोपकरणक्रिया ॥ ८२<br>यस्मिन् कर्मणि यस्य स्याद् विशेषेण च कौशलम् ।<br>तस्मिन् कर्मणि तं राजा परीक्ष्य विनियोजयेत् ।<br>पितृपैतामहान् भृत्यान् सर्वकर्मसु योजयेत् ॥ ८३उद्यमी होना चाहिये। पृथ्वीको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले राजाको सर्वदा सम्मानित एवं पालित उत्तम अनुचरोंको सहायक बनाना चाहिये। वह प्राणियोंको यथायोग्य कर्मोंमें नियुक्त करे। उसे धर्म-कार्योंमें धर्मात्माओंको, युद्धकर्मोंमें शूर-वीरोंको, अर्थ-कार्योंमें उसके विशेषज्ञोंको, सच्चरित्रोंको सर्वत्र, स्त्रियोंके मध्यमें नपुंसकको और भीषण कर्मोंमें निर्दयको नियुक्त करना चाहिये। रविनन्दन! राजाको धर्म, अर्थ, काम और नीतिके कार्योंमें गुप्त पारिश्रमिक देकर अनुचरोंकी परीक्षा करनी चाहिये। उत्तीर्ण होनेवालेको श्रेष्ठ गुप्तचर बनाये और उनके कार्योंकी देखरेख करनेवालोंको उनका अध्यक्ष बनाये। राजन्! इस प्रकार राजाको राज्यके कार्योंका संचालन करना चाहिये। राजाको सर्वथा उग्र कर्मोंवाला नहीं होना चाहिये। नरेश्वर! राजाके जो पापाचरणद्वारा सिद्ध होनेवाले कर्म हैं, उन्हें सत्पुरुष नहीं करते, अतः राजाको भी उनका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि राजाओंके लिये क्रूर कर्माचरण उचित नहीं हैं। राजाको चाहिये कि जिस कार्यमें जिसकी विशेष कुशलता है, उसे उसी कार्यमें परीक्षा लेकर नियुक्त करे; किंतु पिता-पितामहसे चले आते हुए नौकरोंको सभी कर्मोंमें नियुक्त करे, परंतु अपने जातीय कार्योंमें उन्हें न रखे॥ ६९—८३ १/२ ॥
विना दायादकृत्येषु तत्र ते हि समागताः।<br>राजा दायादकृत्येषु परीक्ष्य तु कृतान् नरान् ।<br>नियुञ्जीत महाभाग तस्य ते हितकारिणः ॥ ८४<br>परराजगृहात् प्राप्ताञ्जनसंग्रहकाम्यया।<br>दुष्टान् वाप्यथवादुष्टानाश्रयीत प्रयत्नतः ॥ ८५<br>दुष्टं विज्ञाय विश्वासं न कुर्यात्तत्र भूमिपः।<br>वृत्तिं तस्यापि वर्तेत जनसंग्रहकाम्यया ॥ ८६<br>राजा देशान्तरप्राप्तं पुरुषं पूजयेद् भृशम् ।<br>ममायं देशसम्प्राप्तो बहुमानेन चिन्तयेत् ॥ ८७<br>कामं भृत्यार्जनं राजा नैव कुर्यान्नराधिप ।<br>न च वाऽसंविभक्तांस्तान् भृत्यान् कुर्यात् कथञ्चन ॥ ८८<br>शत्रवोऽग्निर्विषं सर्पो निस्त्रिंश इति चैकतः।<br>भृत्या मनुजशार्दूल रुषिताश्च तथैकतः ॥ ८९<br>तेषां चारेण चारित्रं राजा विज्ञाय नित्यशः।<br>गुणिनां पूजनं कुर्यान्निर्गुणानां च शासनम् ।<br>कथिताः सततं राजन् राजानश्चारचक्षुषः ॥ ९०महाभाग! राजाको पारिवारिक कार्योंमें परीक्षा करके मनुष्योंको नियुक्त करना चाहिये; क्योंकि वे उसके कल्याण करनेवाले होते हैं। अनुचरोंका संग्रह करनेकी भावनासे राजाको चाहिये कि जो अनुचर दूसरे राजाकी ओरसे उनके यहाँ आयें—चाहे वे दुष्ट हों अथवा सज्जन, उन्हें प्रयत्नपूर्वक अपने यहाँ आश्रय दे; किंतु दुष्टको समझकर राजा उसका विश्वास न करे, परंतु जनसंग्रहकी इच्छासे उसे भी जीविका देनी चाहिये। राजाको चाहिये कि दूसरे देशसे आये हुए व्यक्तिका विशेष स्वागत करे और 'यह मेरे देशमें आया है' ऐसा समझकर उसका अधिक सम्मान करे। नराधिप! राजाको अधिक नौकर नहीं रखना चाहिये। साथ ही जो पहले अपने पदसे पृथक् कर दिये गये हों, ऐसे नौकरोंको किसी प्रकार भी नियुक्त न करे। नरशार्दूल! शत्रु, अग्नि, विष, सर्प तथा नंगी तलवार—ये सब एक ओर हैं तथा क्रुद्ध अनुचर एक ओर हैं। (अर्थात् दोनों समान हैं।) राजाको चाहिये कि गुप्तचरद्वारा नित्य उन अनुचरोंके चरित्रकी जानकारी प्राप्त कर उनमें गुणवानोंका सत्कार और निर्गुणोंका अनुशासन करता रहे। राजन्! इसी कारण राजालोग सर्वदा चारचक्षु (अर्थात् गुप्तचर ही जिनकी आँखें हैं ऐसा)