BharatKosha
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 874 of 1098

Read in context
Page 874

८६४ * मत्स्यपुराण *

स्वके देशे परे देशे ज्ञानशीलान् विचक्षणान्।<br>अनाहार्यान् क्लेशसहान् नियुञ्जीत तथा चरान्॥ ९१<br><br>जनस्याविदितान् सौम्यांस्तथाज्ञातान् परस्परम्।<br>वणिजो मन्त्रकुशलान् सांवत्सरचिकित्सकान्।<br>तथा प्रवाजिताकारांश्चारान् राजा नियोजयेत्॥ ९२<br><br>नैकस्य राजा श्रद्दध्याच्चारस्यापि सुभाषितम्।<br>द्वयोः सम्बन्धमाज्ञाय श्रद्दध्यान्नृपतिस्तदा॥ ९३<br><br>परस्परस्याविदितौ यदि स्यातां च तावुभौ।<br>तस्माद् राजा प्रयत्नेन गूढांश्चारान् नियोजयेत्॥ ९४कहलाते हैं। अपने देशमें या पराये देशमें ज्ञानी, निपुण, निर्लोभी और कष्टसहिष्णु गुप्तचरोंको नियुक्त करना चाहिये। जिन्हें साधारण जनता न पहचानती हो, जो सरल दिखायी पड़ते हों, जो एक-दूसरेसे परिचित न हों तथा वणिक्, मन्त्री, ज्योतिषी, वैद्य और संन्यासीके वेशमें भ्रमण करनेवाले हों, राजा ऐसे गुप्तचरोंको नियुक्त करे। राजा एक गुप्तचरकी बातपर, यदि वह अच्छी लगनेवाली भी हो तो भी विश्वास न करे। उस समय उसे दो गुप्तचरोंकी बातोंपर उनके आपसी सम्बन्धको जानकर ही विश्वास करना चाहिये। यदि वे दोनों आपसमें अपरिचित हों तो विश्वास करना चाहिये। इसीलिये राजाको गुप्त रहनेवाले चरोंको नियुक्त करना चाहिये॥ ८४—९४॥
राज्यस्य मूलमेतावद् या राज्ञश्चारदर्शिता।<br>चाराणामपि यत्नेन राज्ञा कार्यं परीक्षणम्॥ ९५<br><br>रागापरागौ भृत्यानां जनस्य च गुणागुणान्।<br>सर्वं राज्ञां चरायत्तं तेषु यत्नपरो भवेत्॥ ९६<br><br>कर्मणा केन मे लोके जनः सर्वोऽनुरज्यते।<br>विरज्यते केन तथा विज्ञेयं तन्महीक्षिता॥ ९७<br><br>अनुरागकरं लोके कर्म कार्यं महीक्षिता।<br>विरागजनकं लोके वर्जनीयं विशेषतः॥ ९८<br><br>जनानुरागप्रभवा हि लक्ष्मी<br>राज्ञां यतो भास्करवंशचन्द्र।<br>तस्मात् प्रयत्नेन नरेन्द्रमुख्यैः<br>कार्योऽतिरागो भुवि मानवेषु॥ ९९राज्यके मूलाधार गुप्तचर ही हैं, क्योंकि गुप्तचर ही राजाके नेत्र हैं। अतः राजाको गुप्तचरोंकी भी यत्नपूर्वक परीक्षा करनी चाहिये। राज्यमें अनुचरोंका अनुराग एवं वैर तथा प्रजाके गुण और अवगुण—राजाओंके ये सभी कार्य गुप्तचरोंपर ही निर्भर हैं, अतः उनके प्रति यत्नशील रहना चाहिये। राजाको यह बात सर्वदा ध्यानमें रखनी चाहिये कि लोकमें मेरे किस कामसे सभी लोग अनुरक्त रहेंगे और किस कामसे विरक्त हो जायेंगे। इसे समझकर राजाको लोकमें अनुरागजनक कार्यका सम्पादन और विरागोत्पादक कर्मका विशेषरूपसे त्याग करना चाहिये। सूर्यकुलचन्द्र! चूँकि राजाओंकी लक्ष्मी उनकी प्रजाओंके अनुरागसे उत्पन्न होनेवाली होती है, इसलिये श्रेष्ठ राजाओंको पृथ्वीपर मानवोंके प्रति प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त अनुराग करना चाहिये॥ ९५—९९॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राज्ञां सहायसम्पत्तिर्नाम पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजाकी सहायक-सम्पत्ति नामक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१५॥


दो सौ सोलहवाँ अध्याय

राजकर्मचारियोंके धर्मका वर्णन

मत्स्य उवाच
यथा च वर्तितव्यं स्यान्मनो राज्ञोऽनुजीविभिः।<br>तथा ते कथयिष्यामि निबोध गदतो मम॥ १**मत्स्यभगवान्ने कहा—**मनु महाराज! अब मैं आपसे राजाके अनुचरोंको उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, यह बतला रहा हूँ, आप इसे सुनिये।