मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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| * अध्याय २१६ * | ८६५ |
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| ज्ञात्वा सर्वात्मना कार्यं स्वशक्त्या रविनन्दन।<br>राजा यत्तु वदेद् वाक्यं श्रोतव्यं तत् प्रयत्नतः।<br>आक्षिप्य वचनं तस्य न वक्तव्यं तथा वचः ॥ २<br><br>अनुकूलं प्रियं तस्य वक्तव्यं जनसंसदि।<br>रहोगतस्य वक्तव्यमप्रियं यद्धितं भवेत् ॥ ३<br><br>परार्थमस्य वक्तव्यं स्वस्थे चेतसि पार्थिव।<br>स्वार्थः सुहृद्भिर्वक्तव्यो न स्वयं तु कथञ्चन ॥ ४<br><br>कार्यातिपातः सर्वेषु रक्षितव्यः प्रयत्नतः।<br>न च हिंस्यं धनं किञ्चिन्नियुक्तेन च कर्मणि ॥ ५<br><br>नोपेक्ष्यस्तस्य मानश्च तथा राज्ञः प्रियो भवेत्।<br>राज्ञश्च न तथा कार्यं वेशभाषितचेष्टितम् ॥ ६<br><br>राजलीला न कर्तव्या तद्विद्विष्टं च वर्जयेत्।<br>राज्ञः समोऽधिको वा न कार्यों वेशो विजानता ॥ ७<br><br>द्यूतादिषु तथैवान्यत् कौशलं तु प्रदर्शयेत्।<br>प्रदर्श्य कौशलं चास्य राजानं तु विशेषयेत् ॥ ८<br><br>अन्तःपुरजनाध्यक्षैर्वैरिदूतैर्निराकृतैः ।<br>संसर्गं न व्रजेद् राजन् विना पार्थिवशासनात् ॥ ९<br><br>निःस्नेहतां चावमानं प्रयत्नेन तु गोपयेत्।<br>यच्च गुह्यं भवेद् राज्ञो न तल्लोके प्रकाशयेत् ॥ १०<br><br>नृपेण श्रावितं यत् स्याद् वाच्यावाच्यं नृपोत्तम।<br>न तत् संश्रावयेल्लोके तथा राज्ञोऽप्रियो भवेत् ॥ ११<br><br>आज्ञाप्यमाने वान्यस्मिन् समुत्थाय त्वरान्वितः।<br>किमहं करवाणीति वाच्यो राजा विजानता ॥ १२<br><br>कार्यावस्थां च विज्ञाय कार्यमेव यथा भवेत्।<br>सततं क्रियमाणेऽस्मिँल्लाघवं तु व्रजेद् ध्रुवम् ॥ १३<br><br>राज्ञः प्रियाणि वाक्यानि न चात्यर्थं पुनः पुनः।<br>न हास्यशीलस्तु भवेन्न चापि भृकुटीमुखः ॥ १४<br><br>नातिवक्ता न निर्वक्ता न च मात्सरिकस्तथा।<br>आत्मसम्भावितश्चैव न भवेत् तु कथञ्चन ॥ १५ | रविनन्दन ! राजाद्वारा राजकार्यमें नियुक्त व्यक्तिको चाहिये कि वह कार्यको सब तरहसे जानकर यथाशक्ति उसका पालन करे। राजा जो बात कह रहे हों, उसे वह प्रयत्नपूर्वक सुने, बीचमें उनकी बात काटकर अपनी बात न कहे। जनसमाजमें राजाके अनुकूल एवं प्रिय बातें कहनी चाहिये, किंतु एकान्तमें बैठे हुए राजासे अप्रिय बात भी कही जा सकती है, यदि वह हितकारी हो। राजन् ! जिस समय राजाका चित्त स्वस्थ हो, उस समय दूसरोंके हितकी बातें उससे कहनी चाहिये। अपने स्वार्थकी बात राजासे स्वयं कभी भी न कहे, अपने मित्रोंसे कहलाये। सभी कार्योंमें कार्यका दुष्प्रयोग न हो, इसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये तथा नियुक्त होनेपर धनका थोड़ा भी अपव्यय न होने दे। राजाके सम्मानकी उपेक्षा न करे, सर्वदा राजाके प्रियकी चिन्ता करे, राजाकी वेश-भूषा, बात-चीत एवं आकार-प्रकारकी नकल न करे। राजाके लीला-कलापोंका भी अनुकरण न करे, वह राजाके अभीष्ट विषयोंको सर्वथा छोड़ दे। ज्ञानवान् पुरुषको राजाके समान अथवा उससे बढ़कर भी अपनी वेशभूषा नहीं बनानी चाहिये। द्यूतक्रीड़ा आदिमें तथा अन्यत्र भी राजाकी अपेक्षा अपने कौशलका प्रदर्शन करे और उसी प्रसङ्गमें अपनी कुशलता दिखाकर राजाकी विशेषता प्रकट करे। राजन्! राजाकी आज्ञाके बिना अन्तःपुरके अध्यक्षों, शत्रुओंके दूतों तथा निकाले हुए अनुचरोंके निकट न जाय। अपने प्रति राजाकी स्नेहहीनता तथा अपमानको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखे और राजाकी जो गोपनीय बात हो, उसे सर्वसाधारणके सम्मुख प्रकट न करे ॥ १-१० ॥<br><br>नृपोत्तम ! राजपुरुष राजाद्वारा कही गयी गुप्त या प्रकट बातको सर्वसाधारणके समक्ष कभी न सुनाये। ऐसा करनेसे वह राजाका विरोधी हो जाता है। जिस समय राजा दूसरे व्यक्तिसे किसी कामके लिये कहें, उस समय बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि शीघ्रतापूर्वक स्वयं उठकर राजासे कहे कि 'मैं क्या करूँ?' कार्यकी अवस्थाको देखकर जैसा करना उपयुक्त हो, वैसा ही करना चाहिये; क्योंकि सदा एक-सा करते रहनेपर निश्चित ही वह राजाकी दृष्टिमें हेय हो जाता है। राजाको प्रिय लगनेवाली बातोंको भी उनके सामने बार-बार न कहे, न ठठाकर हँसे और न भृकुटी ही ताने। न बहुत बोले, न एकदम चुप ही रहे, न असावधानी प्रकट करे और न कभी आत्मसम्मानो होनेका भाव ही प्रदर्शित करे। |