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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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३८ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २२७ (४) बृहती, (५) पङ्क्ति, (६) त्रिष्टुप्, (७) जगती ये सात छन्द सात हाथ स्वरूप हैं । त्रिधा बद्ध अर्थात् ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इन तीन वेदों के द्वारा ऋङ् मन्त्र, साममन्त्र और यजुर्मन्त्र के द्वारा तीन प्रकार से बद्ध है। यह वृषभ अर्थात् कामनाओं का वर्षण करने वाला, सभी कामनाओं का सफल करने वाला है। रोरवीति = पुनः पुनः शब्द करता है अर्थात् ऋत्विक् यज्ञ में स्तोत्र, शस्त्र आदि की आवृत्ति के द्वारा शब्दाय- मान रहते हैं। यह महो देवः परिपूर्ण यज्ञपुरुष है। यह मर्त्यां आविशेश अर्थात् मनुष्यों के मध्य में प्रविष्ट हुए हैं। क्योंकि त्रैवर्णिक मनुष्य ही यज्ञ के अधिकारी हैं। काव्यों में कवियों के द्वारा किसी के सौन्दर्य आदि वर्णन के प्रसङ्ग में चक्रवाकस्तनी, हंसदन्तावली, शैवालकेशिनी नदी आदि रूपक कहा जाता है, प्रकृत में भी इसी प्रकार रूपक के व्याज से यज्ञपुरुष का वर्णन किया गया है। अतः यह अविद्यमान वचन नहीं है। यह निरुक्तकार ने व्याख्या प्रस्तुत की है। वस्तुतः इस मन्त्र का अर्थ गूढ है- महाभाष्य में आचार्य पतञ्जलि ने इस मन्त्र से शब्द ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया है। सर्वदर्शन संग्रह में पाणिनीयदर्शनप्रकरण में एवं ऋग्वेदभाष्यभूमिका में व्याकरण की उपयोगिता-प्रदर्शन-प्रसङ्ग में सायणाचार्य ने महाभाष्य की व्याख्या को उद्धृत किया है-नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात ये चार शृङ्ग के समान हैं। भूत, भविष्य, और वर्तमान ये तीन काल चरण के समान हैं। सुबन्त एवं तिङन्त ये दो मस्तक हैं। सात सुप् विभक्तियां सात हाथ के समान हैं। वक्ष, कण्ठ एवं मस्तक इन तीन स्थानों के विशेष संस्पर्श से शब्दों की अभिव्यक्ति होने से शब्द तीन प्रकार से आबद्ध है। वृषभ कामना वर्षण करते हैं। ये विशेष रूप से रव शब्द करते हैं अर्थात् शब्द विवर्तप्रपञ्च के मध्य में प्रवेश करते हैं, जीव इनसे अभिन्न है क्योंकि जगत् शब्दब्रह्म का विवर्त होने से उसमें अध्यस्त है अर्थात् आध्यासिक सम्बन्ध से कल्पित है कल्पित वस्तु की अधिष्ठान से अतिरिक्त सत्ता नहीं होती है, अतः अधिष्ठान से वह भिन्न नहीं होता है। ऐसा महान् देव शब्द मनुष्यों के बीच विशेष रूप में प्रकट हुआ है। आचार्य सायण ने इस मन्त्र की व्याख्या में विनियोग के अनुसार इस प्रकार कहा है- सूर्य पक्ष में -- दिन का चार प्रहर चार शृङ्ग स्वरूप हैं। शीत, ग्रीष्म और वर्षा ये प्रधान तीन ऋतु तीन चरण के समान हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन ये दो अयन दो मस्तक के समान हैं। प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन एवं तृतीयसवन ये तीन सवनों से त्रिधा आबद्ध है। वृष्टि हेतु होने से वृषभ है। मेघ के शब्द से ये महान् शब्द करते हैं एवं मानवों में प्रसिद्ध होने से महादेव हैं, ये सभी मनुष्यों को उत्साहित करते है क्योंकि सूर्योदय होने पर मनुष्य उत्साह सम्पन्न होते हैं। इसी प्रकार अग्नि, वायु आदि का भी वर्णन इससे किया है।