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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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२२८ मीमांसादर्शनम् [ सू० इसी प्रकार 'अचेतनेऽर्थसम्बन्धात्' १।२।३१ इस सूत्र की व्याख्या में भी जो आपत्तियाँ उपस्थापित की गई हैं वे भी समीचीन नहीं हैं, क्योंकि ओषधे त्रायस्वैनम्, स्वधिते मैनं हिंसीः (तै० सं० १।२।१।१) यह वपन का मन्त्र है, यज्ञ में केश आदि का छेदनरूप संस्कार के समय यथाक्रम कुश एवं क्षुरा को उद्देश्य कर यह पढ़ा जाता है। अर्थात् वपन कर्म में अचेतन ओषधि एवं अस्त्र भी रक्षा करे-हिंसा न करे। चेतन नापित रक्षा करे अर्थात् हिंसा न करे यह कहने की आवश्यकता नहीं रहती है। शृणोत ग्रावाणः (तै० सं० १।३।१३।१) यह मन्त्र प्रातःकालीन अनुवाक के अध्ययन के समय पढ़ा गया है। अर्थात् अचेतन प्रस्तर आदि भी जब पठ्यमान अनुवाक का श्रवण करता है तब विद्वान् ब्राह्मण इसे अवश्य ही सुनेंगे। वेदान्तियों ने इसकी भिन्न व्याख्या की है—अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् (वेदान्तदर्शन २।१।५) इस सूत्र के भाष्य में आचार्य शङ्कर ने कहा है कि मृदब्रवीत्, आपोऽब्रुवन् (श० प० ब्रा० ६।१।३।२,४) मिट्टी बोली, जल बोला। तत्तेज ऐक्षत ता ऐक्षन्त (छा० ६।२।३,४) तेज ने देखा, जल ने देखा। ते हेमे प्राणाः अहं श्रेयसे विवद- माना ब्रह्म जग्मुः, वे ये प्राण (इन्द्रियाँ) अपनी प्रधानता के लिए विवाद करते हुए ब्रह्म के समीप गये इत्यादि प्रसङ्ग में अचेतन भूत, इन्द्रिय आदि ने जो चेतन के समान व्यवहार किया है वह भूत और इन्द्रियों का नहीं है अपितु वहाँ मृत्तिका, जल, तेज एवं इन्द्रियों के अभिमानी चेतन देवता हैं, उनका है। क्योंकि श्रुतियां भूत आदि अचेतनों एवं उसके भोक्ता चेतन के विशेषत्व को कहती है। अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् (ऐ० आ० २।४।२।४) अग्नि वाणी होकर मुख में प्रविष्ट हुआ। इत्यादि कथन से सर्वत्र वाक् आदि इन्द्रियों के मध्य में देवता की अनुगति अर्थात् अधिष्ठातृत्व कहा गया है, इसलिए इन स्थलों में अचेतन पदार्थों का सम्बोधन किया गया है। अतः अभिमानी चेतन देवता का ही अचेतन से उल्लेख किया गया है ॥ ३८ ॥ गुणादविप्रतिषेधः स्यात् ॥ १.२.३९ ॥ शा० भा०—'अदितिद्यौरि'ति गौण एष शब्दः। अतो न विप्रतिषेधः। यथा त्वमेव माता पितेति, तथैकरुद्रदैवत्ये एको रुद्रः, शतरुद्रदैवत्ये शतं रुद्रा इत्यविरोधः ॥ ३९ ॥ भा० वि०—स्वाध्यायवचनेनाभ्यासदोषं परिहरति—विद्येति। तत्र प्रथमं तावत् परेणानुक्तमपि शङ्कान्तरं संभवमात्रेणोपन्यस्य निराकुर्वन् सूत्रं योज- यति—यत्त्विति। अकर्मकाले विद्याकाले, विवक्षितार्थत्वे हि मन्त्राणां विद्या- कालेऽपि मन्त्रेणार्थप्रकाशनेच्छा भवेत्, हन्तिरूपस्यार्थस्य सन्निहितत्वादतस्त- दभावादेवार्थाविवक्षा गम्यत इति यदुक्तम्, तदप्ययुक्तं पूर्णिकाहन्तेरयज्ञाङ्गत्वेन यज्ञोपकाराय प्रकाशनेच्छानुपपत्तेरित्यर्थः, विद्याकाले मन्त्रेणार्थस्यावचनप्र- काशनं प्रकाशनेच्छाभावः असंयोगाद्यज्ञसंयोगाभावादिति सूत्राक्षरार्थः ॥ ३९ ॥