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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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२३६ मीमांसादर्शनम् [ सू० के समान, तुर्फरी = त्वरायुक्त अर्थात् शीघ्रता से शत्रु का वध करने वाले, पर्फरीका = शोभायुक्त, उदन्यजा इव = वर्षाकालीन चातकद्वय के समान, जमना = जलयुक्त अर्थात् जल प्राप्त कर, मदेरू = मत्त अर्थात् आनन्दित, ता = वे अश्विनीकुमार, जरायमरायु = जरामरणशील अर्थात् शरीर, अजरम् = जराहीन (करे) । स्तृण्या, नेत्याशा, उदन्यजा, जेमवा, एवं ता में द्विवचन, औ के स्थान में वैदिक नियम के अनुसार आ हो गया । आशय यह है- अङ्कुश से प्रेरित दो हाथियों के समान जो अतिशय पराक्रम को व्यक्त कर शीघ्रतायुक्त हाथ से शत्रुओं का नाश कर कुशलता के कारण शोभायमान हो रहे हैं, एवं चातक जिस प्रकार जल को प्राप्तकर आनन्दित होता है, वे भक्तों के प्रति उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, वे अश्विनीकुमारद्वय हमारे इस जरामरणशील शरीर को अजर और अमर करें। भूतांश नामक ऋषि इस मन्त्र से अश्विनीकुमारद्वय की स्तुति कर रहे हैं। अभ्यक् सा त इन्द्र ऋष्टिरस्मे सनेम्यमूं मरुतो जुनन्ति । अग्निश्चित्द्धि स्मातसे शुशुक्वानापो न द्वीपं दधति प्रयांसि ॥ (१।१६९।३) अभ्यक् = सहचारी, सा = वह प्रसिद्ध, ते = तुम्हारा, इन्द्र = हे इन्द्र, ऋष्टिः = अस्त्र विशेष या वस्त्र, अस्मे = हम लोगों का, सनेमि = पुराण (सञ्चित) अमूं = जल, मरुतः = वायु, (इन्द्र का वाहन पर्जन्य) जुनन्ति = निक्षिप्त करता है या वृष्टि करता है, अग्निःचित् = अग्नि के समान, हि स्मे = पादपूरणार्थक अव्यय, अतसे = शुष्कतृणे, शुशुक्वान् = दीप्यमान, आपः = जल, द्वीपम् = द्वीप को, दधति = धारण करता है, प्रयांसि = अन्न (शस्यादि) । आशय यह है—हे इन्द्र ? शुष्कतृणपुञ्ज में प्रदीप्त अग्नि जैसे शोभा प्राप्त करती है, तुम्हारा नित्य सहचारी वज्र, वह भी उसी रूप में बाधारहित हो शोभा प्राप्त करता है, एवं वह तुम्हारा अत्यन्त प्रिय वज्र तुम्हारी कृपा से हमलोगों का उपकारक है। और वह आकाश में चिर सञ्चित जल को वृष्टि के रूप में निक्षिप्तकर जल जैसे द्वीप को धारण करता है, वैसे ही हमलोगों के अन्न (शस्यादि) को धारण करता है । तुम्हारा प्रिय मित्र मरुत् अर्थात् पर्जन्य हमलोगों का ही उपकारक है। इस मन्त्र के ऋषि अगस्त्य है, इस मन्त्र से उन्होंने इन्द्र की स्तुति की है ॥ ४१ ॥ उक्तश्चानित्यसंयोगः ॥ १.२.४२ ॥ शा० भा०—परं तु श्रुतिसामान्यमात्रमित्यत्रेति ॥ ४२ ॥ भा० वि०—अनित्यसंयोगप्रसङ्गं परिहरति—उक्तश्चेति। प्रत्युक्तः-परिहृत इत्यर्थः, कुत्र परिहृत इत्यपेक्षायां पूरयन् व्याचष्टे—परमिति । एवं श्रुतिसामान्यं यजमानः प्रार्थयिता इन्द्रश्च प्रार्थ्यमानोऽन्यम (अनित्याः) एव कीकटाः कृपणाः