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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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४२ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २३७ प्रमगन्दः कुसीदवृत्तिः प्रकर्षेण धनं मामागमिष्यतीति एवं ददातीति प्रमगन्द., नीचाशाखः = षण्ढः तदीयं धनं नैचाशाखं तत्सर्वमयज्ञाङ्गभूतं तेषां कर्मण्यप्रवृत्तेः तदस्माकमाहरेति ॥ ४२ ॥ त० वा०—परं तु श्रुतिसामान्यमात्रमिति । यजमानस्तावत्प्रार्थयिता, इन्द्रश्च प्रार्थ्यमानः सर्वदाऽस्ति । कीकटा नाम यद्यपि जनपदाः तथाऽपि नित्याः । अथ वा सर्वलोकस्थाः कृपणाः कीकटाः । प्रमगन्दः—कुसीदवृत्तिः । स हि प्रभूततरमागमिष्यतीत्येवं ददाति । नीचाशाखः—षण्ढः तदीयं धनं नैचा- शाखम् । तच्च सर्वमयज्ञाङ्गभूतम्, तेषां कर्मण्यप्रवृत्तेः तदस्माकमाहरेति । शेषं गतार्थम् ॥ ४२ ॥ न्या० सु०—यस्त्वनित्यसंयोगः शङ्कितः, स परं तु श्रुतिसामान्यमित्यत्र सूत्रे प्रत्युक्त इति । सूत्रव्याख्यानार्थं परं त्विति भाष्यं व्याचष्टे—परमिति । श्रुतिसामान्यमात्रतां दर्शयति—यजमानस्तावदिति । प्रमगन्दनैचाशाखशब्दयो राजनगरविशेषसंज्ञत्वे सत्यनित्य- संयोगापत्तेरन्यथा व्याख्यानम् ॥ ४२ ॥ भा० प्र०—उक्तः = कह दिया गया है, अर्थात् दे दिया गया है। च = और, अनित्यसंयोगः = अनित्य संयोग अर्थात् अनित्य या नश्वर अर्थ के साथ वाचकता संयोग । जन्ममरणशील अर्थ के साथ मन्त्र का वाचकता सम्बन्ध रहने से मन्त्रार्थ विवक्षित होने पर वह अनित्य है, अतः अप्रमाण होता है, इस प्रकार की आपत्ति का निराकरण किया है अर्थात् पूर्वपाद में उसका उत्तर दे दिया गया है। आशय यह है कि—मन्त्रों का स्वार्थ विवक्षित नहीं है, यह प्रतिपादन करने के लिए पूर्वपक्षी ने अनित्यसंयोगात् (१।२।११) इस सूत्रांश में 'किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः' इत्यादि मन्त्रों के दृष्टान्त में आपत्ति का उत्थापन कर कहा है कि मन्त्रों का स्वार्थ विवक्षित होने पर 'कीकट' नामक जनपद, नैचाशाख नामक नगर एवं प्रमगन्द नामक राजा आदि अनित्य जन्ममरणशील अर्थ के वाचक हैं, अतः मन्त्र अनित्य अर्थात् पौरुषेय एवं अप्रमाण हो जायगा, किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि इन सभी मन्त्रों में जन्म- मरणशील अनित्य वस्तु के विषय में नहीं कहा गया है। "परं तु श्रुतिसामान्यमात्रम्" (मी० १।१।३१) इस सूत्र में प्रतिपादन किया गया है। वस्तुतः वेद में जिस रूप में कहा गया है, उसके अनुरूप घटना हुई थी यह कहने पर भी कोई असम्भव बात नहीं कही गई है, क्योंकि आज के समय में भी इस प्रकार की अनेक घटनाएँ घटित होती हैं, जो किसी की उक्ति या भविष्यवाणी के अनुरूप रहती हैं। आचार्य कुमारिलभट्ट ने तन्त्रवार्तिक में कीकट शब्द का अर्थ निर्देश करते हुए लिखा है कि कीकट = कृपण । प्रमगन्द = कुसीदवृत्ति । नीचशाख = षण्ढ, (नपुंसक) उसका धन नैचाशाख है, अर्थात् नपुंसक का धन । इन अर्थों को कहने वाले इन शब्दों का जनन-