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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 396 of 804

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Page 396

३४४ मीमांसादर्शनम् [ सू० होगा और उससे उपकार होगा । इसी दृष्टि से किसी ऋत्विक् ने औदुम्बरी स्तम्भ प्रमाण वस्त्र से उसका वेष्टन किया था और वही स्मृति हो गई, अतः, लोभ आदि दृष्ट कारणों के आधार पर ही स्मृति होने से श्रुतिमूलक यह स्मृति नहीं है । यतः श्रुतिमूलक यह स्मृति नहीं है, अतः यह आदरणीय नहीं है । फलतः यह स्मृति अप्रमाण है । 'हेतुदर्शनाच्च' इस सूत्र का भाष्यकार ने स्वतन्त्र एक अधिकरण के रूप में व्याख्यान किया है । यथाः-वैसर्जनहोमीयं वासः अध्वर्युर्गृह्णाति अर्थात् वैसर्जन नामक होम का वस्त्र अध्वर्यु ग्रहण करे, इत्यादि स्मृति प्रमाण है या अप्रमाण है- इस प्रकार के संशय में पूर्वपक्षी ने कहा कि प्रथम अधिकरण में कथित नियम के अनुसार ही यह स्मृति भी प्रमाण होगी । इसी प्रस्तुत प्रसङ्ग में सिद्धान्ती ने कहा है कि-"'हेतुदर्शनात् च'" । इस प्रकार का स्मृतिवचन प्रमाण नहीं । क्योंकि ऐसे स्थल में स्मृति का मूल लोभादि ही हेतु के रूप में दृष्ट होता है । किसी ऋत्विक् के द्वारा लोभ आदि के कारण सभी वस्त्रों का ग्रहण करने पर इस प्रकार की प्रथा का प्रचलन हुआ । अतः इस प्रकार की स्मृति श्रुतिमूलक नहीं है, किन्तु लोभादिमूलक है, अतः यह श्रुतिमूलक न होने से अप्रमाण है । यह भी आशङ्का सङ्गत नहीं है कि एकत्र अप्रमाण होने पर सर्वत्र ही अप्रामाण्य होगा; कारण, ऐसा मानने पर उत्सर्ग और अपवाद का नियम ही समाप्त हो जायेगा । सभी शास्त्रों में सामान्य विधि और विशेष विधि है और सामान्य विधि विशेष विधि से बाधित होती है । किन्तु ऐसा होने से ही क्या सामान्य विधि सर्वथा अप्रमाण हो जाती है ? अतः विशेष विधि के द्वारा सामान्य विधि का बाध होने पर भी जैसे सामान्य शास्त्र का अप्रामाण्य नहीं होता है वैसे ही किसी-किसी स्थल में स्मृति अप्रमाण होने पर भी उसका सामान्यतः प्राप्त प्रामाण्य व्याहत नहीं होता है । वरन् वह प्रामाण्य अव्याहत ही रहता है । तन्त्रवार्तिक में इस सूत्र की व्याख्या भिन्न रूप से की गई है उनका कथन है कि- "स्मृतीनां श्रुतिमूलत्वे दृढ़े पूर्वं निरूपिते । विरोधे सत्यपि ज्ञातुं शक्यं मूलान्तरं कथम् ॥" पूर्व अधिकरण में वर्णित युक्तियों के द्वारा महाजन परिगृहीत स्मृतियों की वेदमूलकता जब दृढ़ रूप से अवधारित है तब उसकी स्थल विशेष में अन्यमूलकता स्वीकार करना उचित नहीं है, विभिन्न वेद शाखाओं में उपदिष्ट सामान्य आवश्यककर्तव्य वचन का मनु आदि सर्वज्ञ महर्षियों के द्वारा स्मृति के रूप में स्वतन्त्र भाव से निबद्ध किया गया है । क्योंकि, उसमें साधारण अनुष्ठेय अन्य शाखाओं में उपदिष्ट सभी विषयों की अवगति होती है एवं शाखा के साङ्कर्य से सम्प्रदाय का भी उच्छेद नहीं होता है । ऐसी स्मृति को स्थल विशेष में श्रुतिमूलक और स्थल विशेष में लोभादिपूर्ण कहना शोभा- दायक नहीं है । यदि यह कहा जाय कि उन स्थलों में लोभादिरूप कारण का जब अनुमान होता है तब अनुमित का पुनः अनुमान न होने से श्रुतिमूलकता या मूल प्रकृति का अनुमान नहीं हो सकता है । ऐसी स्थिति में कहना है कि-