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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 397 of 804

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Page 397

४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३४५ रागद्वेषमदोन्मादप्र मादालस्यलुब्धताः । क्व वा नोत्प्रेक्षितुं शक्याः स्मृता प्रामाण्यहेतवः ॥ का वा धर्मक्रिया यस्यां दृष्टो हेतुर्न युज्यते । कथञ्चिद् वा विरुद्धत्वं प्रत्यक्षश्रुतिभिः सह ॥ लोकायतिकमूर्खाणां नैवान्यत्कर्म विद्यते । यावत्, किञ्चिददृष्टार्थं तत् दृष्टार्थं हि कुर्वते ॥ वैदिकान्यपि कर्माणि दृष्टार्थान्येव ते विदुः । अर्थात् राग, द्वेष, मद, प्रमाद आलस्य एवं लुब्धता=लोभ आदि के स्थलों में जिसको स्मृति के मूल की कल्पना कर विशेष स्मृतियों का अप्रामाण्य माना जाता है, किसी स्थल में ही या उनको स्मृति का मूल मानकर स्मृति के अप्रामाण्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। क्योंकि, सभी स्मृति-वाक्य को राग, द्वेष लोभादिमूलक ही मानना पड़ेगा। कारण, ऐसा कोई भी धर्म, कर्म नहीं है; जिसके द्वारा साध्य कोई न कोई लौकिक प्रयोजन न रहे अर्थात् सभी धर्मों का साध्य कोई लौकिक प्रयोजन रहेगा ही और ऐसी कोई स्मृति भी नहीं है जिसका किसी न किसी श्रुतिवाक्य से किसी न किसी अंश में विरोध न हो। लोकायतिक एवं मूर्खों को इससे अतिरिक्त कोई काम भी नहीं है। उनको जो भी अदृष्टार्थक कर्म है सभी को दृष्टार्थक अर्थात् ऐहिक प्रयोजन सम्पादक सिद्ध करना है। जैसे होम लक्ष्यकर इस समय के चार्वाक कहते हैं कि इससे दूषित वायु नष्ट होती है। इसीप्रकार जितने भी वैदिक कर्म समूह है उनको दृष्टार्थक अर्थात् लौकिक प्रयोजन का सम्पादक मानते हैं। यदि स्मृति को लोभादि मूलक कहते हैं तो वेद में भी दक्षिणा- दान, तुलापुरुषदान, महादान आदि जो कर्म हैं उनको भी स्मृति के समान लोभमूलक कहा जा सकता है। इसकी पर्यालोचना कर कहा जा सकता है कि -- ‘तस्माल्लोकायतस्थानां धर्मनाशनशालिनाम् । एवं मीमांसकैः कार्यं न मनोरथपूरणम् ॥ यच्चादौ श्रद्धया सिद्धं पुनर्न्यायेन साधितम् । आज्ञासिद्धप्रमाणत्वं पुराणादिचतुष्टयम् ॥ तत्तथैवानुमन्तव्यं कर्तव्यं नान्तराश्लथम् ॥” आशय यह है कि - इस प्रकार से लोकायतमतावलम्बियों के मनोरथ को पूर्ण करना मीमांसकों का कर्तव्य नहीं है। किन्तु पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र इन स्मृतियों का प्रामाण्य उनके द्वारा उपदिष्ट विधि से ही सिद्ध है, इसलिए वैदिक पूर्व से ही स्वाभाविक श्रद्धा से इन्हें स्वीकार करते हैं और यह युक्तियों से भी साधित है। इनका प्रामाण्य इसी रूप में अर्थात् वेदमूलक ही सिद्ध करना उचित है, किन्तु मध्य में उसको शिथिल करना उचित नहीं है अर्थात् स्मृति को स्थल विशेष में लोभादिमूलक