BharatKosha
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

Page 103 of 173

Read in context
Page 103

१०६ मुद्राराक्षस-

मलयकेतु ।—विजये ! तुम दबे पाव से उधर से आओ, मै पीछे से जाकर मित्र भागुरायण की आखें बन्द करता हूं । प्रतिहारी ।—जो आज्ञा । ५ [दोनों दबे पाव से चलते है और भासुरक आता है] भासुरक ।—[ भागुरायण से ] बाहर क्षपणक आया है, उस को परवाना चाहिए । भागुरायण ।—अच्छा, यहा भेज दो । भासुरक ।—जो आज्ञा [ जाता है ] । १० [ क्षपणक आता है ] क्षपणक ।—श्रावक को धर्म लाभ हो ! भागुरायण ।—[छल से उसकी ओर देख कर] यह तो राक्षस का मित्र जीवसिद्धि है [ प्रगट ] भदन्त ! तुम नगर में राक्षस के किसी काम से जाते होगे । १५ क्षपणक ।—[कान पर हाथ रख कर छी छी ! हम से राक्षस वा पिशाच से क्या काम ? भागुरायण ।—आज तुम से और मित्र से कुछ प्रेम कलह हुआ है, पर यह तो बताओ कि राक्षस ने तुम्हारा कौन अपराध किया है ? २० क्षपणक ।—राक्षस ने कुछ अपराध नही किया है, अपराधी तो हम है । भागुरायण ।—ह ह ह ह ! भदन्त ! तुम्हारे इस कहने से तो मुझ को सुनने की और भी उत्कण्ठा होती है । मलयकेतु ।—( आप ही आप ) मुझ को भी । २५ भागुरायण ।—तो भदन्त ! कहते क्यो नही ? क्षपणक । तुम सुन के क्या करोगे ? भागुरायण ।—तो जाने दो, हमैं कुछ आग्रह नही है, गुप्त हो तो मत कहो ।