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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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पंचम अङ्क । १०७

पणक ।—नहो उपासक ! गुप्त ऐसा नही है, पर वह बहुत बुरी बात है।

भागुरायण ।—तो जाओ, हम तुम को परवाना न देंगे।

ज्ञपणक ।—( आप ही आप की भांति ) जो यह इतना आग्रह ५ करता है तो कह दे (प्रत्यक्ष ) श्रावक ! निरुपाय हो कर कहना पड़ा। सुनो—मै पहिले कुसुमपुर मे रहता था, तब संयोग से मुझ से राक्षस से मित्रता हो गई, फिर उस दुष्ट राक्षस ने चुपचाप मेरे द्वारा विषकन्या का प्रयोग करा के बिचारे पर्व्वतेश्वर को मार डाला।

मलयकेतु ।—'आखों में पानी भर के) हाय हाय ! राक्षस ने १० हमारे पिता को मारा, चाणक्य ने नही मारा। हा !

भागुरायण ।—हां, तो फिर क्या हुआ ?

क्षपणक ।—फिर मुझे राक्षस का मित्र जान कर उस दुष्ट चाणक्य ने मुझ को नगर से निकाल दिया, तब मैं राक्षस के यहा आया, पर राक्षस ऐसा जालिया है कि अब मुझ १५ को ऐसा काम करने कहता है जिस से मेरा प्राण जाय।

भागुरायण ।—भदन्त ! हम तो यह समझते है कि पहिले जो आधा राज देने कहा था, वह न देने को चाणक्य ही ने यह दुष्ट कर्म्म किया, राक्षस ने नही किया।

क्षपणक ।—(कान पर हाथ रख कर ) कभी नही, चाणक्य तो २० विषकन्या का नाम भी नही जानता, यह घोर कर्म्म उस दुर्बुद्धि राक्षस ही ने किया है।

भागुरायण ।—हाय हाय ! बड़े कष्ट की बात है। लो, मुहर तो तुम को देते हैं, पर कुमार को भी यह बात सुना दो।

मलयकेतु ।—(आगे बढ़ कर ) २५
सुन्यो मित्र, श्रुति भेद कर, शत्रु कियौ जो हाल।
पिता मरन को मोहि दुख, दुगुन भयो एहि काल ॥