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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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१०८ मुद्राराक्षस—

क्षपणक।—(आप ही आप) मलयकेतु दुष्ट ने यह बात सुन लिया तो मेरा काम हो गया (जाता है)। मलयकेतु।—(दात पीस कर ऊपर देख कर) अरे राक्षस ! ५ जिन तोपै विश्वास करि, सौप्यौ सब धन धाम। ताहि मारि दुख दै सबन, साचो किय निज नाम ॥ भागुरायण।—(आप ही आप) आर्य चाणक्य की आज्ञा है कि “अमात्य राक्षस के प्राण की सर्वथा रक्षा करना” इस से अब बात फेरैं। (प्रकाश) कुमार ! इतना आवेग मत कीजिये। आप आसन पर बैठिए तौ मैं कुछ निवेदन करू। १० मलयकेतु।—मित्र क्या कहते हो? कहो (बैठजाता है)। भागुरायण।—कुमार ! बात यह है कि अर्थशास्त्रवालों की मित्रता और शत्रुता अर्थ ही के अनुसार होती है, साधारण लोगों की भांति इच्छानुसार नही होती। उस समय सर्वार्थसिद्धि को राक्षस राजा बनाया चाहता था तब देव पर्व्वतेश्वर ही इस कार्य में कटक थे तो उस कार्य की सिद्धि के हेतु यदि राक्षस ने ऐसा किया तो कुछ दोष नही। आप देखिए— मित्र शत्रु ह्वै जात हैं, शत्रु करहि अति नेह। अर्थ नीति बस लोग सब, बदलहि मानहु देह॥ २० इस से राक्षस को ऐसी अवस्था मे दोष नही देना चाहिये। और जब तक नन्दराज्य न मिलै तब तक उस पर प्रकट स्नेह ही रखना नीति सिद्ध है, राज मिलने पर कुमार जो चाहैंगे करेंगे। मलयकेतु।—मित्र ! ऐसा ही होगा। तुम ने बहुत ठीक सोचा २५ है। इस समय इस के वध करने से प्रजागण उदास हो जायगे और ऐसा होने से जय में भी सन्देह होगा।

(एक मनुष्य आता है)