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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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छठा अङ्क। १३३

राक्षस।—(आप ही आप दुःख से) मित्र की विपत्ति मे हम पराए लोगों की भांति उदासीन हो कर जो देर करते हैं मानो उस मे शीघ्रता करने की यह अपना दुःख करने के बहाने शिक्षा देता है। (प्रकाश) भद्र! जो रहस्य नही है तो हम सुना चाहते है कि तुम्हारे दुख का क्या ५ कारण है? पुरुष।—आप का इस मे बड़ा ही हठ है तो कहना पड़ा। इस नगर मे जिष्णुदास नामक एक महाजन है। राक्षस।—(आप ही आप) वह तो चन्दनदास का बड़ा मित्र है। १० पुरुष।—वह हमारा प्यारा मित्र है। राक्षस।—(आप ही आप) कहता है कि वह हमारा प्यारा मित्र है। इस अति निकट सम्बन्ध से इस को चन्दनदास का वृत्तान्त ज्ञात होगा। पुरुष।—(रोकर) "सो दीन जनों को सब धन देकर वह १५ अब अग्निप्रवेश करने जाता है" यह सुन कर हम यहा आये है कि "इस दुख वार्ता सुनने के पूर्व ही अपना प्राण दे दें।" राक्षस।—भद्र! तुम्हारे मित्र के अग्निप्रवेश का कारण क्या है? कै तेहि रोग असाध्य भयो कोऊ जाको न औषध २० नाहि निदान है। पुरुष।—नही आर्य्य। राक्षस।—कै विष अग्निहुसो बढ़ि कै नृपकोप महा फसि त्यागत प्रान है। पुरुष।—रामराम! चन्द्रगुप्त के राज्य मे लोगों को प्राणहिंसा २५ का भय कहा? राक्षस।—कै कोउ सुन्दरी पै जिय देत लग्यो हिय माहि विशेषा को बान है।