मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
Page 131 of 173
Read in context१३४ मुद्राराक्षस-
पुरुष ।—रामराम ! महाजन लोगों की यह चाल नही, विशेष कर के साधु जिष्णुदास की।
राक्षस। तौ कह मित्रहि को दुख वाहू के नास को हेतु तुम्हारे मान है।
५ पुरुष ।—हा, आर्य्य । राक्षस ।—(घबडा कर आप ही आप) अरे, इस के मित्र का प्रिय मित्र तो चन्दनदास ही है और यह कहता है कि सुहृद् विनाश ही उस के विनाश का हेतु है इस से मित्र के स्नेह से मेरा चित्त बहुत ही घबड़ाता है। (प्रकाश) भद्र ! तुम्हारे मित्र का चरित्र हम सविस्तर सुना चाहते हैं।
१० पुरुष ।—आर्य्य ! अब मै किसी प्रकार से मरने मे विलम्ब नही कर सकता। राक्षस ।—यह वृत्तान्त तो अवश्य सुनने के योग्य है इससे कह। पुरुष ।- क्या करैं ? आप ऐसा हठ करते हैं तो सुनिये।
१५ राक्षस ।—हा ! जी लगा कर सुनते हैं, कहो । पुरुष ।—आप ने सुना ही होगा कि इस नगर मे प्रसिद्ध जौहरी सेठ चन्दनदास है। राक्षस ।—[ दुख से आप ही आप ] दैव ने हमारे विनाश का द्वार अब खोल दिया। हृदय ! स्थिर हो अभी न जाने क्या क्या कष्ट तुम को सुनना होगा। (प्रकाश) भद्र ! हम ने भी सुना है कि वह साधु अत्यन्त मित्रवत्सल है ।
२० पुरुष ।—वह जिष्णुदास के अत्यन्त मित्र है। राक्षस ।—[ आप ही आप ] यह सब हृदय के हेतु शोक का वज्रपात है [ प्रकाश ] हा, आगे।
२५ पुरुष ।—सो जिष्णुदास ने मित्र की भांति चन्द्रगुप्त से बहुत बिनय किया। राक्षस ।—क्या क्या ?